शुक्रवार, 27 मई 2011

आसीरबाद

आसीरबाद

दिसम्बर के महीना,साँझ के लगभग चार बजत होइ! हम नानी से कहनी –आज बुध के दिन ह।गजराजगंज में आज बाजार लागल होइ ,एह से हम जा तानी कुछ तरकारी लेले आवे।बाजार ह एह से तरकारी ताजा मिली आ कुछ सस्ता भी ।
नानी सूप में तीसी फटकत रहे। हमार बात सुन के कहलस –सोचनी हा कि तहरा खातिर मेथी बान्हि दिहीं।दिली-बम्बे रहे के बा ओहिजा कहाँ मिलत होइ इ सब।बड़ा भाग से त आइल बाड़ ।बाजारे जा तार त दू किलो गुड़ ले लिह आ जवन तरकारी पसन्द परी तवन ले लीह ।फ़ेर कुछ सोच के कहलस –बबुआ तहरा लिट्टी बड़ा निमन लागेला।घरे सातू(सत्तू) बा,आज तहरा खाये खातिर लिट्टी लगा दे तानी।एह से तनी हरियर मरचाई आ आदी(अदरख) ले ले अइह।
ठीक बा नानी –कहके हम झोला लेके बाजारे चल देनी।गजराजगंज बाजार घरे से आधा कोस जमीन परेला।गाँव से बहरी निकलनी त देखनी कि हमरा आगे-आगे एगो बूढ़ आदमी लाठी लेले गते-गते चलल जाता। बाल पाक के एकदम सन नियन उजर,कुरता पीठ प तीन जगह फ़ाटल जवना प पेवन लागल रहे आ ओह पेवन में छेद भइल रहे। चश्मा दूनो कमानी भिरी से कपड़ा के डोरी बना के बान्हल रहे। गोड़ में एगो खियाइल हवाई चप्पल । हमरा से पीछे से ना चिन्हाइल कि कवन आदमी ह । हम आपन चाल बढ़ा देनी आ ओह आदमी से आगे निकल अइनी।आगे आके जब पीछे मुड़ के देखनी त हमरा मुँह से निकल गइल- भरत बाबा?
उ आदमी हमरा से आपन नाम सुन के ओहीजे खड़ा हो गइले आ आपन चश्मा के सीसा में से हमरा के पहिचाने के कोसिस करे लगले।देखनी उनका ललाट पर तीन गो रेखा बन आइल। बाकिर बुढ़ापा के कमजोर नजर के चलते उ हमरा के ना चिन्ह पइले।हम उनकर दूनो गोड़ छू के प्रणाम कइनी।
बनल रह बबुआ। हमेसा आगे मुँहे बढ़ ।भगवान तहरा के बढ़न्ति देस ……।बाकिर बबुआ हम तोहरा के चिन्ह ना पवनी।
भरत बाबा से एके साथे तीन गो आसीरबाद पाके पता ना मन में एगो अजीब संतोष नियन बुझाइल। बाबा तू त ना चिन्हल बाकी हम तहरा के चिन्हतानी नू। हम तहार दीपक ।उहे दीपक जवना खातिर तू रोज अपना बगइचा में से अमरुद ले आवत रह । आ समूचा बधार हम तहरे कान्ह प बइठ के त घूमल बानी।
बड़ा जोर से हँसले भरत बाबा आ कहले –आरे बउराह,तोरा के हम कइसे भुला जाइब।तनी नजर कम हो गइल बा बबुआ।अउर कह कइसन बाड़? कहाँ बाड़ आज काल्ह ?सुननी हा कि सरकारी नोकरी में बाड़ !
हम धीरे-धीरे भरत बाबा साथे बतियावत आगे बढ़े लगनी।उनकर बात के जबाब देनी-हँ बाबा,सरकारी नोकरी में ही बानी।एह घरी दिल्ली में बानी।
कवना विभाग में बाड़ बबुआ?
बाबा एविएसन में इंजिनियर बानी। देखनी कि बाबा के माथ प बल पर गइल।बुझला एविएसन ना बुझाइल उनका।फ़ेर हम उनका के समझावे के लहजा में कहनी-बाबा हवा में जवन जहाज उड़ेला नू,ओकरे में हम इंजिनियर बानी।माने कि ओह जहाज के बनाइला।बुझाइल कि एह बेर हमार बात उनका बुझा गइल ।
वाह बबुआ बहुत निमन ,बनल रह । मन खुश हो गइल सुन के। छुट्टी आइल बाड़ बबुआ?
हँ बाबा, नानी एहिजा अकेले नू बाड़ी ।एह से आके देख जाइला।माई कै बार नानी के कहलस कि ओकरा साथे शहर में चल जास ।बाकिर नानी जाये के तेयार नइखी।कहेली कि हमार अपने सै बिगहा खेत बा ,ओकरा के छोड़िके बेटी किहाँ ना जाइब ।एह से हमहीं जब छुट्टी मिलेला त आ जाइला नानी के देखे खातिर ।
हँ बबुआ,जबले तहार नाना जिंदा रहले हा तबले उनका भीरी जात रहीं जा।बड़ा निमन आदमी रहले हा । जबसे उ एह दुनिया से गइले तब से हमनियों के तहरा दुआर प जाइल कम हो गइल।बेचारी तोर नानी अकेलहीं नू बाड़ी।कबो-कबो आदमी जाला ओहिजा,बाकिर मन भर उठेला ।जवन दुआर कबो गह-गह करत रहे अब भांय- भांय करेला।
बाबा एहिसे हमहुँ चल आइला ।काहे कि हमार जनम करम त सब एहिजे नू भइल बा।तनि नानी के भी मन दोसर हो जाला।
बहुत निमन करेल बबुआ ,तहरा नाना के त तहार माई एके बेटी रहली हा ।दोसर केहु त हइयो नइखे ।तु ना देख-रेख करब अपना नानी के त के करी। आ पइसा के कवनो कमी नइखे तहरा नानी के ।तहार नाना बहुत अरज के गइल बाड़े।
हम भरत बाबा के बात बड़ी ध्यान से सुनत रहीं आ रस्ता प उनका साथे आगे-आगे चलल जात रहीं।उ आगे कहे लगले- बबुआ बड़-बूढ़ के सेवा कइल बड़ा निमन ह आ खूब आसीरबाद मिलेला । आ जान जइह नू बबुआ जब बड़-बूढ़ के आसीरबाद कपार प रही नू त तहार जहाज कबो ना मराई।कवनो आन्ही-तूफ़ान में रहि उ ओहीजा से निकल आई।एह से जतना लोग तहरा से बड़ होखे उनकर आसीरबाद लेबे में पीछे मत रहीह आ अपना नानी के मन से सेवा कर बबुआ।
भरत बाबा के इ बात हमरा मन में उतरत चल गइल।फ़ेर बाजार भइल आ हमनी के तरकारी लेके ओसहीं हाल समाचार बतियावत घरे आ गइनी जा। मामा किहाँ से हम कुछ दिन रह के वापस नौकरी प दिल्ली आ गइनी।
दिल्ली आके ह काम में लाग गइनी। कुछ दिन बीत गइल।हमरा नौकरी के काम से डिपार्टमेंट के जहाज से ही पुणे जाये के रहे।सबेरे आठ बजे जहाज पुणे खातिर उड़ल ।जहाज में तीन गो पायलट आ दू गो हमार साथे काम करे वाला लोग रहे।जहाज उड़ला आधा घंटा भइल होइ आ जहाज लगभग पंद्रह हजार फ़ीट के हाइट प लेबल फ़्लाइंग करत रहे।सोचनी कि कुछ नाश्ता कर लिहीं काहे कि जहाज के पुणे पहुँचे में एक घंटा और लागी।जइसे ही हम आपन बैग खोले खातिर बढ़नी अचानक हमरा जोर के झटका लागल आ हम जहाज के फ़र्श पर गिर पड़नी।कुछ सोचे के समय ना मिलल काहे कि जहाज एक तरफ़ से झुक गइल रहे आ तेजी से जमीन के ओर गिरत रहे। छाती आटा मिल के मशीन नियन जोर-जोर से धड़कत रहे। मन सन्न रह गइ आ देह में बुझाइल कि जान नइखे। जहाज के एगो इंजन शायद धीरे-धीरे बंद होत रहे आ उ तेजी से जमीन के ओर गिरल जात रहे। इ त बुझा गइल कि अब जान ना बाँची ।बहुत ढेर होइ त दू से तीन मिनट ।साँच कहीं त अब इहे बुझात रहे कि कइसे माई-बाबूजी के मुंह एक बेर देख लेतीं।सब देवी-देवता लोग के रुप आँख के सोझा नाचे लागल । हमरा साथे जे भी रहे ओकर हालत उहे रहे जवन कि हमार। जहाज तेजी से जमीन के ओर गिरल जात रहे आ हमार आँख भी अब मुँदाइल जात रहे।इहे लागत रहे कि जहाज अब जमीन से टकराई आ हमनी के माँस के लोथड़ा बन जाइब जा।सबसे अन्त में याद परल भरत बाबा के बात जवन कि कान में गूँजे लागल- आ जान जइह नू बबुआ जब बड़-बूढ़ के आसीरबाद कपार प रही नू त तहार जहाज कबो ना मराई। एकाएक जहाज में फ़ेर झटका लागल आ जहाज के जमीन के तरफ़ गिरल रुक गइल आ फ़िर जल्दी से ऊपर उठे लागल। जइसे ही जहाज सीधा भइल हम काकपिट के तरफ़ भगनी ।जमीन से जहाज के बीच लगभग सात हजार फ़ीट के दूरी रह गइल रहे।देखनी कि पायलट लोग के चेहरा पर भी हवा उड़त रहे आ रेडियो संपर्क पर बात चलत रहे-
टावर कंट्रोल, वी आर कमिंग टू बेस……
एवरीथिंग नार्मल सर…
नो…,इट्स एन इमर्जेंसी…
हमरा सबकुछ समझ में आ गइल ।जहाज के दू गो इंजन में से एगो इंजन में खराबी आ गइल रहे आ उ बंद हो गइल रहे।एह समय जहाज एक इंजन पर ही उड़त रहे। हमार देह काँप उठल इ सोच के कि कहीं दोसरका इंजन मत बंद होखे।जतना भगवान होले हम सब के गोहरावे लगनी।अब भी कान में भरत बाबा के आवाज़ गूँजत रहे- आ जान जइह नू बबुआ जब बड़-बूढ़ के आसीरबाद कपार प रही नू त तहार जहाज कबो ना मराई।
भगवान के नाम लेत लेत आखिर जहाज सही सलामत वापस बेस में लैंड कर ही गइल।जब जहाज से बाहर निकलनी तब बुझाइल कि दोसर जनम भइल बा ।आँख के कोर से लोर पोंछ्नी जवन कि पता ना कब आँख से बह आइल रहे। सब लोग के चेहरा जिंदा लौटला के खुशी रहे बाकिर ओह दर्द के निशानी अभी तक ना मिट पाइल रहे जवन कि कुछ देर पहिले मिलल रहे। हम पायलट के धन्यवाद कहे गइनी।
थैंक्स…सर्…
फ़ोर व्हाट?
फ़ोर सेविंग आवर लाइफ़ सर्।
से थैंक्स टू गोड,ही इस ओन्ली सुपर मोस्ट पाइलट्………
हमार जान में जान आइल ।भगवान जी के धन्यवाद देनी। आ मन में भरत बाबा के आवाज सुनाई पड़त रहे-। आ जान जइह नू बबुआ जब बड़-बूढ़ के आसीरबाद कपार प रही नू त तहार जहाज कबो ना मराई।
आ जान जइह नू बबुआ जब बड़-बूढ़ के आसीरबाद कपार प रही नू त तहार जहाज कबो ना मराई।

-सुस्मित सौरभ

गुरुवार, 31 मार्च 2011

माई

कहानी
माई
ट्रींग-ट्रींग …………पापा के मोबाइल के घंटी बाजल।
पापा कवनो काम करत रहन एह से हमहीं फ़ोन उठवनी।
हैलो,के बोलता?पुष्पक! का हाल बा हो,ठीक बाड़ नु?
के, दीपक भइया?गोड़ लागतानी।हम ठीक बानी।तु कहिया अइल हा दिल्ली से?
खुश रह।काल्हे अइनी हा हो। आ तु कहिया आव तार?दसहरा में अब तीने दिन बाकी दिन बा।
काल्ह सांझ के गाड़ी धरब आ परसों भोरे उतर जाइब ।कलकत्ता से आरा आवे में कतना देर लागेला?माई बिया?तनी माई के मोबाइल दिह त।
हँ ,एहिजे बिया ,दे तानी ।
इहे कह के मोबाइल माई के धरा दिहनी।
माई का-का बतियवलस इ त हमरा ना बुझाइल बाकी आहे प बुझे के कोसिस करे लगनी।पहिले त उ पुष्पक के आसीरबाद(आशिर्वाद) दिहलस ।फ़ेर नीक-जबुन पूछे लागल।बुझाइल कि पुष्पक कुछ किने(खरीदे) खातिर माई के कहलस, काहे कि माई एने से मना कके कहे लागल- ‘हमरा खातिर कुछ मत किनिह’। आ मोबाइल हमरा के दे देलस।पुष्पक अभी लाइन पर ही रहे।कहे लागल-
‘देख तार नु दीपक भइया,हमार नया नोकरी लागल बा आ पहिले-पहिल पइसा मिलल बा।माई से कहनी हा कि तोरा खातिर एगो साड़ी किन के ले आव तानी त मना कर तिया।साथे के सब लइका अपना घरे के लोग खातिर कुछ ना कुछ किन के ले जा तारन स।’
‘आरे जानत नइख।माई नु हिय ।हमनी पर लाखों रुपया खरच करे के होइ त कर दिही बाकिर अपना खातिर कुछ खरच ना कइल चाहे।तहरा जवन निमन लागी तु लेले अइह।’ हम इहे कह के फ़ोन काट देनी।
हमनी के दू गो भाई बानी जा। पुष्पक हमरा से cछोट ह। हम दिल्ली में एगो सरकारी नोकरी करी ला। पुष्पक एगो मल्टीनेसनल कँपनी में सौफ़्ट्वेयर इंजिनियर बा। अभी दु महीना पहिले कलकत्ता में ज्वाइन कइलस हा।पापा सरकारी हाई स्कूल में मास्टर बाड़न ।माई घरे के काम काज देखे ले।हम दसहरा के छुट्टी में घरे आइल बानी।
दोसरा दिने भोरे-भोरे पुष्पक भी घरे आ गइल । हाल समाचार भइल ।सब केहु खातिर कुछ ना कुछ ले आइल रहे।पापा खातिर एगो बढ़िया सूट के कपड़ा आ हमरा खातिर एगो जींस टी-सर्ट ले आईल रहे।सबसे अंत में निकललस एगो साड़ी जवन कि उ माई खातिर ले आईल रहे।खूब निमन सिलिक(सिल्क) के साड़ी रहे बंगाली प्रिंट के।बड़ा निमन लागित माई पहिरित त।देखले से महंगा बुझात रहे। पापा व्यंग कइले-‘बुझात त बा कि सबसे महंगा समान तहरा माई के ही आईल बा का हो ,दीपक?’
पुष्पक हँसे लागल।कहलस-‘ना पापा,अइसन बात नइखे ।तहरो कपड़ा कवनो सस्ता ना ह।बाकिर माई के साड़ी तहरा कपड़ा से एक हजार रुपया महंगा ह । सूट त 5000 रुपया के ह आ साड़ी 6000 के।माई सब सुनत रहे,पुष्पक से कहे लागल-‘तु बउराह हव। अतना महंगा साड़ी किनला के कवन जरुरत रहल हा?’पइसा धरित अपना लगे ,बाहर-भीतर रह तार। कवनो कामे आइत।
माई के बात सुन के पुष्पक डबडबा गइल आ कहलस-माई तोरा के हम लाखों रुपया के साड़ी ले आइब तबो उ हमरा खातिर कम होई।ओह गरीबी में हमनी खातिर तु जवन कइले बाड़े ओकर मोल हमनी से ना दिआई। माहौल तनी गंभीर हो गइल।
पुष्पक फ़ेर कहे लागल-दीपक भइया,तहरा त इयाद बा नु कि हमनी के कवन हाल रहे जब पापा के स्कूल के सब मास्टर लोग के वेतन एके हाली बंद हो गइल रहे आ पापा केआमदनी के जरिया खेती छोड़ के और कुछ ना रह गइल रहे।तबो पापा हमनी के आरा के सबसे बढ़िया स्कूल में पढ़ावत रहन आ हमनी के कवनो कमी ना होखे दिहले। पापा आ माई, हमनी के मन इ बात कबो ना आवे देल लोग कि वेतन ना मिलला से उनका लोग के हमनी के पढ़ावे में कवनो दिक्कत होता।
हँ हो ,इ त तू ठीके कह तार।जतना तेयाग(त्याग) इ लोग हमनी खातिर कइले बा लोग ओकर मोल हमनी से कबो दिहल जाई?कबो ना दिहल जा सके।–हम कहनी।
पुष्पक के आँखिन के कोर से लोर बाहर निकल के गाल प आ गइल रहे।बुझाइल कि पुरान घाव फ़ेर से हरियर हो गइल बा।उ आपन लइकाईं के बात सोच के ढ़ेर भावुक हो गइल रहे।पापा आ माई अकचका के खाली ओकर मुँह ताकत रहे लोग ।उ आगे कहे लागल-
बड़ स्कूलन में गरीब के लइकन के कबो ना पढ़े के चाहीं।काहे कि ओहिजा पढ़ाई से जादे चमक-दमक प ध्यान देल जाला। तहरा इआद पड़ता नू उ दिन जहिया हमनी के स्कूल में पैरेंट्स डे मनावल जात रहे।एगो त जबरजस्ती हमनी दूनो भाई के ओह में गुजराती नाच में हिस्सा लेबे खातिर मजबूर कइल गइल आ ओह में पेन्हे खातिर कुरता-पैजामा और चुंदरी प्रिन्ट के ओढ़नी आ आठ गो रुमाल के वेवस्था करे के कहल गइल । हमनी के आके इ बात माई से कहनी जा।माई कुरता-पैजामा के वेवस्था त अगल-बगल से माँग के क देलस बाकी ओढ़नी आ रुमाल ना मिल पाइल ।खरिदे खातिर हिसाब जोड़ाइल त लगभग डेढ़ सौ रुपया होत रहे जवन कि हमनी के परिवार ढ़ेर महँगा रहे ।
पुष्पक के बात सुन के हमरो आँख के सामने उ दिन सिनेमा के पर्दा के चित्र नियन साफ़-साफ़ लउकत रहे आ हमरो मन भीतर से भरल आवत रहे।बाकी मन के कठोर कइले रहीं।देखनीं कि पापा आ माई एक दोसरा देने चोर के नजर देखत रहे लोग । पुष्पक कहले जात रहे-
तब बड़ा सोच में पड़ गइल आदमी कि का कइल जाव?एक दिन के नाच-गान खातिर अतना पइसा खरच करे में हमनी के सोचे के पड़त रहे काहे कि घरे के आर्थिक स्थिति भी ठीक ना रहे।अंत में माई आपन एक-दू बेर के पेन्हल चुन्दरी प्रिन्ट के नया साड़ी ले आइल आ ओकरा के कइंची से काट के हमनी खातिर ओढ़नी आ रुमाल बना के दिहलस ।तब हमनी के गइनी जा स्कूल में सब कपड़ा लेके आ हमनी के नाच-गाना भइल।
–इहे कह के पुष्पक आपन बात खतम क इलस।अब ओकरा मुँह पर एगो शांति के भाव रहे आ लोर सुखा गइल रहे दुनो गाल पर।
माई के देखनी ,ओकरा मुँह प एगो मुस्कान रहे।बुझात रहे कि हमनी से कहत रहे कि तू लोग ब उराह हव लोग ।पापा भी भाव-विह्वल हो ग इल रहले।कुछ देर ले सब लोग शांत रहल ।फ़ेर बात उघरल पुष्पक देने से ही।उ माई देने देख के कहलस-
आ ओह दिन हम इ सोच लेले रहीं माई कि जहिया हम नोकरी करब त पहिले तोरा खातिर एगो खूब निमन साड़ी खरीदब ।
हमनी के बेटा अब बड़ हो गइलन स,ना हो ।-पापा माई देने देख के कहले।
आरे,बउराह हवन स इ।माई-बाप के कामे ह अतना करे के।अब उठ लोग,खाना नइखे खाये के?-इहे कह के माई रसोईयाघर देने चल देलस ।

-सुस्मित सौरभ

संतोष

संतोष

इ मालूम त नइखे कि हमार सोचल कतना सही बा, लेकिन हमरा इहे बुझाला कि आदमी के जब घाव लागेला त ‘दरद के अहसास’,ओतना ना होखे जतना कि ओह घाव पर सनेह से मरहम लगावत समय होला ।एगो छोट लइका खेलत-खेलत भहरा के गिर परेला आ पहिले चारो ओर ताकेला,फ़ेर जइसे ही ओकर नजर घर के कवनो सनेहिल आदमी प परेला त उ जोर-जोर से रोवे लागेला।हमरो एह बात के पता अभी कुछ दिन पहिले ही चलल हा। बात इ भइल कि हम जवन विभाग में काम करीला ओहीजा बिन बियाहल लोगन के रहे आ खाये के वेवस्था(व्यवस्था) मेस में कइल जाला आ ओह लोगन में से एगो प्रतिनिधि होलन जे मेस के प्रबंधन के काम देखेलन।कुछ दिन खातिर इ भार हमरा के भी दिहल गइल।मेस में खाना टेबुल प पहुँचावे आ पलेट धोवे खातिर दू-तीन गो लइका रहेलन स ।ओहनिओ के देख रेख हमरे जिम्मे रहे।ओहनी से खाना लगवावे,घटल-बढ़ल देखे,पलेट साफ करवावे ,कुल मिला के सारा बेवस्था जवना से खाये वाला लोग के कवनो दिक्कत ना होखे, हमरे देखे के रहे।संजोग से तीनो लइकवा भोजपुरी बोले वाला रहन स एह से ओहनी से हमरा तनी बेसी लगाव हो गइल रहे।उमिर का होइ इहे पंद्रह से अठारह बरिस के होइहें स।एगो जवन Sसबसे बड़ रहे उ बलिया जिला के रहे आ दू गो छोटका बक्सर आ सासाराम के रहन स।तीनो के नाम एक लाइन से सुभाष,हरेन्दर आ जवाहर रहे।बड़ा इज्ज्त देत रहन स बेचारा ।भोजपुरी में ही ओहनी से बतियइतीं,हमार एके बोली प कवनो काम करे के तेयार रहतन स।मेस में खाये वाला भी ओहनी के काम से खुश रहे लोग।सब लोग से सर-सर कह के इज्जत से बतियइतन स,सब काम धाम करितन स ,मेस चम-चम करित ।केहु के हमरा प्रबंधन से कवनो सिकाइत ना रहे।भले लोग चुट्की लिहित “सौरभ जी,सब बिहारियों का संगठन बना लिये हैं।”
हम कुछ ना कहितीं खाली मुस्काके रह जइतीं।
जवाहर नाम के जवन लइका रहे उ हमरा से तनी ढेर घुलल मिलल रहे।एक दिन रात के खाना के बेरा प असहीं बतियावत रहीं त पूछनी –जवाहर,पढ़ाई लिखाई कुछ भइल बा कि ना?
हँ, सर मैट्रिक पास हईं।
त दोसर कवनो काम काहे ना कइला हा?
कहाँ काम मिलता सर?सगरे इहे हाल बा तीन हजार रुपेया में हाड़ तूर के काम करे के परेला ।एहीजा पइसा त तनी कम भेंटाला बाकिर खाये आ रहे खातिर कवनो खरच त ना लागे। अतनवे बहरी के पाँच हजार के बराबर बा।
मन लगेला?घरे से अतना दूर!
मन के का बा ए सर, खाये के मिली त कतहीं मन लागी।
कवनो तकलीफ़ नइखे नू ?कवनो गाढ़ सकेत होइ त कहिह ।
ना सर, सब राउर किरपा बा।
फ़ेर कुछ देर बाद उ कहलस-सर आज तरकारी नु खूबी बढ़िमा बनी है। आपकी खाना टेबुल में चहुँपा दूँ?
हमरा ओकर हिन्दी सुन के हँसी छुटल,कहनी- आरे अँग्रेज तू हमरा से भोजपुरी ना बोल सकेल?
ना सर उ हमहुँ हिन्दी बोले के सीख तानी नू।
nnnnnnठीके बा,सीख। हँ,आज खाना हमरा रूम में पहुँचा दीह। आज चाय जादे पी लेले बानी ,एह से भोजन तनी देर से करब ।
ठीक बा सर ,कहके आपन काम में लाग गइल।
रात के साढ़े नौ बजत होइ ।मुखर्जी जी शराब के नशा में धुत्त खाना खाये अइले। हम जवाहर से कहनी –“जवाहर तनी खाना लगा दे,हँ तनी धेयान से,बुझाता कि पियले बाड़े।”
कभी-कभी आदमी के कवनो बात के आभास समय से पहिलहीं हो जाला।हमरा जवन बात के डर रहे उहे भइल।जवाहर पहिले खाना दे देलस आ पानी देबे के
भुला गइल।तब तक मुखर्जी जी चिल्ला उठले-अरे जोवहोर,बहेन …,पानी कौन देगा रे,तेरा बाप?
जवाहर दौड़ के गइल पानी लेके।पानी देबे के चक्कर में तनी सा पानी मुखर्जी जी के गोड़ प गिर गइल ।फ़ेर का रहे माध……,बहिन……जइसन गारी के बरखा हो गइल जवाहर पर।बेचारा “गलती हो गया सर, गलती हो गया सर’’कहके माफ़ी माँगे लागल। बुझाइल कि मुखर्जी जी ओकरा के मार मत देस।हम जाके बीच-बचाव कइनी तब जाके ओकर जान छुटल। दस बजे मेस बंद हो गइल आ जवाहर हमार खाना लेके रूम में आइल ।देखनी कि ओकर मुँह उतरल रहे।
कहलस-सर खाना ले आइल बानी,खा लीहीं।
खा लेब,ध द ।तू खइल ?
ना सर।मन नइखे।
आरे बउराह,कवनो बात के हतना धर धइल जाला।जवन हो गइल तवन हो गइल। नोकरी करे नु आइल बाड़ ,इ सब होत रहेला।खाल ला एहिजे,हमरे में से दू गो रोटी ले ल।
हमार इ बात सुन के उ फ़फ़क उठल ।हमरा बुझाइल कि हम ओकर मन के घाव के गलती से छू देनी!कुछ देर रोवलस।हमहुँ ओकरा के रो लेबे देनी जेकरा से कि मन में दबल दरद निकल जाव ।फ़ेर कहे लागल –“सर देखनी हा नु कतना गारी देले हा।घरे हमरा के आज ले केहु डँटले ना रहे।”-उ तनी ढेर भावुक हो गइल रहे।
देख जवाहर,दारु-शराब पियला के बाद आदमी का कहेला ,इ ओकरा अपने ना याद ना रहे ।देख, दारु पिये वाला जब बोले त जनिह कि कवनो पागल कुकुर बर-बर कर ता। हमार इ कुकुर वाला बात सुन के ओकरा हँसी छूट गइल ।ओकरा के हँसत देख के मन के तनी सा राहत मिलल।इ बुझा गइल कि कवनो रोवत आदमी के हँसावे में कतना संतोष मिलेला। ओकरा के बरियारी दू गो रोटी खिया के भेजनी आ कहनी –“जा,जा के मन शांत कके सुत जा,ढ़ेर ना सोचे के।ओकरा गइला के बाद हमहुँ खाना खा के सुते के तेयारी करे लगनी।बाकी मन में एगो बड़ संतोष रहे।


-सुस्मित सौरभ

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

अकिला फुआ

अकिला फुआ
अकिला फुआ ‌‍जइसे कि नाम से जगजाहिर बा गाँव के उ औरत जेकरा अकिल से समूचा गांव चलेला . हर गांव में एकाध गो अकिला फुआ रहेला लोग .भोजपुर में कहाउत कहल जाला कि “बिना गांगो के झूमर ना होखे”ओसहीं बिना अकिला फुआ के कवनो जग परोजन ना पार लाग सके. केहू किहाँ लइका भइल होखे,केहू के बकरी भुलाइल होखे,कवनो बियाह शादी होखे चाहे केहू किहाँ चोरी भइल होखे सगरे अकिला फुआ के बोलावल जाला.
हमरो गाँव में एगो अकिला फुआ बाड़ी .उनकर असली नाम त कुछ और ह लेकिन उनका के अकिला फुआ के नाम से ही बोलावल जाला .
एक बेर के बात ह.सिकुमार पांडे के बेटी के बियाह रहे .बरियात के दिन रहे .लइकी के ससुरा से पेन्हावे खातिर लुगा-झूला आइल रहे.लइकी के ससुरा वाला तानी एडभांस रहन स.एह से कपड़ा लत्ता संगे एक जोड़ी सैंडिल भी भेजले रहन स.सब कपड़ा लत्ता पेन्हावला के बाद गाँव के औरतन के नजर सैंडिल पर पड़ल .अब ओहनी के बुझइबे न करे कि इ कवन गहना ह ?सब लोग बड़ा फेरा पर गइल कि अब का कइल जाव .अगर ना पेन्हावल जाइ त लइकी के ससुरावालन के सोझा बेइज्जत होखे के परी.कहिहन स कि एकदम गंवार बाड़न स.आ पेन्हावल जाव त कवना अंग में पेन्हावल जाव इ बुझात न रहे.सांप छुछुन्दर वाला हाल भइल रहे .ना सैंडिल पेन्हावही आवत रहे आ इज्जत जाए के डर से छोड़तो ना बनत रहे .अब का कइल जाव.अंत में सभके सलाह भइल कि अब अकिला फुआ ही कुछ कर सकेली आ उनके के बोलावल जाव .आदमी दउड़लन स अकिला फुआ के बोलावे खातिर .आधा घंटा के बाद गत्ते-गत्ते चलत अकिला फुआ अइली .आवते लइकी के माई अकिला फुआ के गोड़ प गिर गइली आ दूनो आँखिन में लोर भर के कहे लगली –“आह ए फुआ जी , अब हमनी के इज्जत रउरे हाथ में बा .कसहूँ हमनी के इज्जत राखीं .”
अकिला फुआ लइकी के माई के उठवली आ आँचर से उनकर लोर पोछ के कहली –“चुप रह बउरहीनिया.हम जिन्दा बानी नू .कवन अइसन काम बा जे अकिला फुआ ना जानस .देखाव ता कवन गहना आइल बा जवन तोहनी के पेन्हावे नइखे आवत .”
अकिला फुआ के सैंडिल देखावल गइल .एक बेर त उहो सोच में पर गइली.कुछ देर सैंडिल के उलट-पलट के देखली .फेर कुछ सोच के हँसे लगली.कहली –“आह ए हमार करम,अब हम का करीं?आरे,तहरा लोग के तबे से इहे ना बुझात रहल हा!”
सब लोग अकिला फुआ के घेर लेल . ‘का ह फुआ जी,का ह फुआ जी’ कहे लागल लोग.ओही में से केहू कहल –‘हम कहत रहीं नू कि अकिला फुआ सब जानेली .उ जरुर बता दिहें कि इ गहना कहाँ पेन्हल जाला?’
अब अकिला फुआ के पारी रहे . कहली –“आरे इ नएका जमाना के आयरन(इयररिंग)नू ह”.आ फेर लइकी के माई से कहली-“आरे रामझरिया के माई,ले जो आपना बेटी के कान में पहिरा दे”.
आँगन में के भीड़ अकिला फुआ के जय जयकार करे लागल .आ सैंडिल लइकी के दूनो कान में पहिरा देल गइल .
“ अथश्री अकिला फुआ आख्यान”

मोटरसाइकिल से उड़ान

संस्मरण
मोटरसाइकिल से उड़ान

ठीक से ख्याल त नइखे परत कि इ कब के घटना ह बाकी अतना इयाद आवता कि हम इंटर पास कर गइल रहीं । ओह उमिर में देह में तनि ढेर जोस नु रहेला ।बात इ रहे कि हमरा मोटरसाइकिल चलावे के सवख(शौक) बड़ा जोर मरले रहे।उमिर का होइ ओह घरी ,इहे सतरह बरिस के होखब, कवनो ढेर ना रहे।सबसे बड़ बात त इ रहे कि हमरा छोटका भाई के मोटरसाइकिल चलावे आवत रहे ,आ हमरा उ चीज ना आवत रहे ,त तनि लाजो लागत रहे।मन ओह घरी बड़ा छोट हो जात रहे जब हम मोटरसाइकिल प अपना छोटका भाई के पीछे बइठ के कहीं आवत जात रहीं। उहो त पंदरहे बरिस के रहे ,एह से खुला छूट त ओकरो ना रहे बाकी इ रहे कि छोट-मोट काम मोटरसाइकिल से क लेआवत रहे । हं,त कहत रहनी हा कि मोटरसाइकिल चलावे त आवत ना रहे बाकिर पापा वाला इस्कूटर तनि-मनि चला लेत रहीं। छोटका भाई के ढेर साथी-संघाती रहन स एह से उ मोटरसाइकिलो प हाथ साफ क लेले रहे।
भगवान जी हमरो विनती सुनत रहन।उनको बुझाइल कि लइका साथे अनेयाय होता । आ हमरो मोटरसाइकिल चलावे के मौका मिलिए गइल।भइल का कि मामा के बियाह लागल ।लगन-पताइ के दिन रहे एह से गाड़ी-बस कि दिक्कत रहले रहे।काम –काज में कवनो आकाज चाहे कुबेरा मत होखे एह से हितइ से तीन गो मोटरसाइकिल मंगावल रही स । हमरा त भल के भलभलिये नु मिल गइल। छोटका भाई के मर-मनावन कइनी त उहो हमरा के मोटरसाइकिल सिखावे के तेयार हो गइल।बाकिर तय इ भइल कि मोटरसाइकिल के चाभी मांगे के काम हमार रही । चाभी मिले में भी कवनो ढेर परेसान ना होखे के परत रहे काहे कि बियाह-सादी के दिन में सभ केहु जुटल रहे,ओह मे केहु मामा रहे त केहु मौसा त केहु नाना।तनि-मनि ना-नुकुर कइला के बाद इ चेता के कि ‘गोड़-हाथ मत तुरिह लोग’ ,चाभी दे देत रहे लोग ।घर के आगे एगो छोट खरिहान रहे।ओकरे में तीन चार दिन में हम मोटरसाइकिल चलावे के सीख त लेनी बाकिर पक्का ड्राइबर ना भइल रहीं।
मामा के तिलक में एगो मोटरसाइकिल चढ़ल । हीरो-होन्डा के नया चमचमात मोटरसाइकिल । नया मोटरसाइकिल देख के हमरा छोटका भाई के मन में खुद्बुदी ले लेलस।एक दिन के बाद उ हमरा भिरी गते से आके कहता-
‘दीपक भैया रे,एगो बात कहीं?’
हम कहनी –‘कह ,का कह तारे?’
‘कह तानी नु कि नयेका हीरो-होन्डावा ना चलावे के?’
‘मन कइला से सब हो जाला?के दिही हमनी नियन नवसिखुआ के नया गाड़ी?’
‘मामा तोर बात के मानेलन ।तू मंगबे त दे दिहन।’
‘का उ इ ना जानस कि हमरा मोटरसाइकिल ना चलावे आवे।’
‘कह दिहे कि तु ना चलइबे हम चलाइब।’
‘ठीक बा देखब’-अतना कह के हम दोसर काम में लाग गइनी बाकिर अब इ बात हमरो दिमाग में घूमे लागल ।
बुध कि दिन रहे आ ओह दिन गजराजगंज में बाजार लागत रहे।सांझ के तरकारी ले आवे खातिर हमार खोजाहट होखे लागल काहे कि लइकन में बड़ हमहीं रहीं ।मौका त मिल गइल हमरा आ हमहूं ओकर फायदा उठाइये लेनी।मान मनौवल के बाद मोटरसाइकिल के चाभी हमरा हाथ में आइये गइल। ढेर बात कहल लोग ,चेतावल लोग, बाकिर कुछे सुनाइ देलस काहे कि नया गाड़ी चलावे के खुशी नु रहे। दुनो भाई पहिर-ओढ़ के चल देनी ज बाजार करे, नया मोटरसाइकिल प बइठ के, चलावत छोटके भाई रहे।बाजार में पहुंच के तरकारी खरिदाइल आ कुछ परचून के समान लेबे खातिर कवनो दोकान खोजाए लागल। अब हमार पारी रहे मोटरसाइकिल चलावे के ,एह से हम छोटका भाई से चाभी मंगनी।उ कहलस:-‘आरे ,आज बाजार ह आ भीड़ देखत नइख?एह से हमहीं मोटरसाइकिल चलाव तानी काहे कि तु अभी नया बाड़।भीड़ में कहीं धक्का मार देब।’
बाकिर हम ठान लेले रहीं कि आज हम मोटरसाइकिल चलइबे करब ।एह से बेचारा भाई के चाभी हमरा के देबहीं के परल । हम मोटरसाइकिल इस्टाट कइनी ,मन में खुशी त होते रहे ,बाकिर एगो डर नियन भी समाइल रहे ।जसहीं गेयर में डाल के गाड़ी आगे बढ़वनी ,गाड़ी बंद हो गइल । भाई फेर मना कइलस बाकिर घरी टेढ़ रहे आ हम ना मननी।दोबारा मोटरसाइकिल इस्टाट कके चल त देनी बाकिर जसहीं दस कदम गइल होखब तसहीं आगे से एगो ट्रक आ गइल ।पातर रोड रहे एह से मोटरसाइकिल धीम कर के ट्रक के निकले देनी आ जसहीं फ़ेर आगे बढ़े के कइनी पता ना चलल कि का भइल कवन गेयर लागल, कि कलच छुटल,गाड़ी हांय-हांय करके हवा में उड़ गइल। मोटरसाइकिल के अगिला चक्का उपर मुहें उठ गइल आ भाई जवन कि पिछिला सीट प बइठल रहे ,पीछे से घसक के नीचे गिर परल । गाड़ी के आवाज सुन के आ हालत देख के अगल-बगल के जतना आदमी रहन स, भाग चललन स। हमार त आंखेऽ मुदा गइल बाकिर गाड़ी अभी तक बंद ना भइल रहे। हमरा तनिको ना बुझाइल कि कब मोटरसाइकिल के अगिला चक्का जवन कि ऊपर उठल रहे,बगल के एगो दोकान के ओटा(छोट चबूतरा) पर जाके रुकल जवना के ऊंचाई लगभग चार फीट रहे । हमार आंख खुलल त देख तानी कि गाड़ी के अगिला चक्का ओटा पर टंगाइल बा आ पिछिला चक्का जमीन प बा आ साथे साथे हमहुं गाड़ी प लटकल बानी।एगो गोड़ कसहुं सहारा लेके गाड़ी के गिरे से बचा रहल बा। मोटरसाइकिल रह रह के हांय-हांय कर रहल बा आ एगो चक्का ओटा प बा एह से आगे नइखे बढ़ पावत ।तब जाके हम गाड़ी बंद कइनी।भर देह से हराहर पसेना छूटत रहे आ गोड़ थर-थर कांपत रहे।कसहुं मन के शांत कके दुनो भाई गाड़ी के अगिला चक्का के ओटा प से नीचे उतरनी जा । अगल-बगल ढेर लोग जमा हो गइल काहे कि ढेर दिन प लोगन के बिना पइसा के मन लाएक तमाशा देखे के मिलल रहे।ओह में से कुछ लोग कहत रहे कि जब ना चलावे आवे त काहे के चलावे ल लोग ।मन त लाजे काठ भइल जात रहे।इहे रहे कि मोटरसाइकिल में कुछ टूट-फूट भइल ना रहे खाली एक-आध गो खरोंच लागल रहे जवन कि बुझात ना रहे ।हमरा गोड़ में मोच आइल रहे बाकिर उ ओह समय दुखात ना रहे।
‘तोरा चोटो लागल बा ?’हम भाई से पूछ्नी।
‘ना। आ तोरा?’उ हमरा से पूछलस।
हमरो नइखे लागल।इहे कह के हम गाड़ी के मुआयना कइनी आ चाभी भाई के दे देनी। मोटरसाइकिल ओहिजे खड़ा करके परचून के समान किनाइल ।दस मिनट बाद घरे लवटे के बेरा इयाद परल कि मामा खातिर पान ले जाये के बा ।पान खरीदे खातिर बगल के पान के दोकान प गइनी जा त ओहिजा एगो हमरे उमिर के लइका बइठल रहे आ अपना आ अपना दादी से कहत रहे:-
‘दादी ए सड़कि प मत जइहे । आज शहर में से नया मोटरसाइकिल चलवनिहार आइल बाड़न स। आ जान तारे कि ना उ मोटरसाइकिल हाऽवाऽ में उड़ा दे तारन स । अबके नु घन्टा भ पहिले बाजार में भऽगद्दड़ मचल रहल हा।झलकिया के माई मुए से बाचल हिया।’
ओकर बात सुन के हमनी के दुनो भाई एक-दोसरा देने देख के धीरे से मुस्कुरा देनी जा।

सुस्मित सौरभ

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

मैट्रिक के परीक्षा

कहानी
मैट्रिक के परीक्षा



जब मैट्रिक के परीक्षा नजदीक आवेला त कवनो ना कवनो कथनी के जनम होइये जाला। एह बेर के परीक्षा में भी कुछ अइसन ही भइल ।अबकी बेर जब हम मामा घरे गइनी त कुछ नया कथा सुने के मिलल।भइल का कि हम गजराजगंज बाजार प उतर के अपना मामा घरे जाये खातिर पैदल चल देनी।जाड़ा के दिन रहे आ संझवत के बेर हो गइल रहे। डेढ़ कोस जमीन पैदल चलला के बाद गांव में हेलत हेलत अन्हार हो गइल।गांव के बहरी धूस प बुझाइल कि कुछ नवहा लइका हुड़गुड़ान कइले बाड़न स । नजदीक गइनी त देखनी कि सब आपने टोला के लइका रहन स आ दिसा-मैदान करे गांव के बहरी आइल रहन स।
“गोड़ लाग तानी दीपक भइया’’-ओह में से तीन गो चिन्ह के प्रणाम कइलन स ।
“खुश रह लोग”- इहे कह के हम ओहनी से गांव घर के नीक-जबुन पूछे लगनी। “जान तार कि ना भइया ?काल्ह मोहन बाबा त पिटा गइले ।पुलिस खूब मरले बिया।”-एगो लइका कहलस।
“काहे खातिर हो?”-हम आपन मफ़लर ठीक करके कहनी । एकरा बाद उ लइका सब कथा सुनावे लागल-
“आरे काहे खातिर ?काल्ह गइल रहन मैट्रिक के परीक्षा के सेंटर पर ।इनकर भतीजी नू परीक्षा दे तिया। चोरी करावे खातिर देवाल प चढ़ल रहन ।साथे त हरेन्दर भइया रहन, आ किसुना चाचा भी । जब पुलिस डंटा लेके खदेरलस त ऊ लोग त देवाल प से कूद के भाग गइल लोग, बाकिर इ पचास बरिस के आदमी ना भागे पइले आ धरा गइले ।पहिले त पुलिसवा पांच डंटा मरलस फ़ेर अपना एसपी भीरी ले गइल आ कहता- ‘सर, इ बुढ़वा चोरी करवा रहा था।’ ‘सरवा’………बुढ़ आदमी देवाल पर चढ़ गया था और इससे कूऽऽऽदे नहीं हुआ। हा हा हा………………
ओकरा बाद पुलिस मोहन बाबा के थाना में ले गइल रहे ।दू हजार रुपया लेलस तब छोड़्लस। पइसा त गांवे के रंगलाल साह से बीस रुपया सैकड़ा के भावे सूद प उठा के गइल हा।”

लइकन के मंडली में से एगो दोसर लइका, जवन अब तक चुप रहे ,कहे लागल --
“मोहन बाबा त कहत रहले हा कि जब थाना में गइले त थाना में के बड़का साहेब इनका के चिन्ह गइल आ ‘क्षमा महाराज’ कहके गोड़े पर लोटिया गइल। उ त उनकर जजमान नू रहे ।पहिले अपना सिपाही के चार झापड़ मरलस ।ओकरा बाद कहे लागल कि ‘महाराज जी गलती हो गइल।इ बुरबक सिपाही रउरा के ना चिन्हलस महाराज।’फ़ेर एगो सिपाही से कह के चाह-चुक्कड़ मंगवलस ।चाह –पानी पियला के बाद उ
मोहन बाबा के एक सै एकइस गो रुपया से गोड़पूजी कके अपना सिपाही संगे जीप से भेजे लागल त मोहन बाबा ओकरा के बरियारी एक हजार रुपया दे दीहले आ कहले –‘ जजमान ,तहार नोकरी के बात बा ।चोरी में धराइल बानी त फ़ाएन भरहीं के नू परी।एह से हइ रुपयइवा ले ल ।आ तब मोहन बाबा ओहीजा से अइले।”
“आ चुप ना रह ।इ बभना असहीं हांकेला।ओकरा खाये के बा अपना घरे ? मांग के त खाला। चलल बा पइसा देबे।पीठांस प लाठी बाजल बा पुलिस के, त लाजे का कही?लाज पचावता।” -एगो दोसर लइका कहलस । हम खाली चुप सब सुनत रहीं।
फ़ेर पहिलका लइका कहे लागल लागल-“आ जान तार कि ना ? सत्यम मिसिर के भी दू लाठी बाजल बा।”
सत्यम मिसिर हमार लइकाईं के संघतिया रहन । हमरा इ बात सुन के अचरज भइल।उनकर बाबूजी ओही शहर में मकान बनवले बाड़े जहां एह बेर मैट्रिक के परीक्षा के सेंटर रहे ।हम पूछ लेनी –“उ काहे पिटा गइले हो?”
उ लइका कहे लागल-“जब परीक्षा चलता, ओह बेरा प सेन्टर प घूमे जइब, त मार ना खइब ?उनका के दरोगा पकड़ लेलस आ कहता -‘ अरे लौंडा, तुम यहां चोरी करवाने आया है?’सत्यम भाइ त आपन फ़ैशन में हाफ़ पाएंट में घूमत रहन ,कह तारे-‘नहीं सर ,हम तो मौर्निंग वाक करने आये हैं’। दरोगवा खिसिया गइल आ कहता-‘बहिन…………,दिन में बारह बजे मौर्निंग वाक कर रहा है।’आ दू लाठी मरलस ।बेचारे सत्यम मिसिर आपन पिछ्वाड़ा सुहरावत ओहीजा से भाग चलले।”
“आ जान तार कि ना भ इया अब त तिरभुवन बाबा के बहार भइल बा। भर गांव में कहत चलत तारे कि ‘मोहना’ त चोरी करावत धराइल बा ,उ कुजात हो गइल ।‘बाभन धरम आ इहे करम।’ अब ओकरा से पूजा-पाट करावे के धरम नइखे ।एह से अब हम भर गांव में पूजा कराइब।”
दोसरका लइका के इ बात सुन के हम हंस पड़नीं । नजर उठा के देखनीं त घर भी आ गइल रहे आ नाना जी ललटेन जरा के दालानी में रामायण पढ़त रहन ।

-सुस्मित सौरभ
एयर फ़ोर्स स्टेशन,हिन्डन
गाजियाबाद,यू पी