शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

मैट्रिक के परीक्षा

कहानी
मैट्रिक के परीक्षा



जब मैट्रिक के परीक्षा नजदीक आवेला त कवनो ना कवनो कथनी के जनम होइये जाला। एह बेर के परीक्षा में भी कुछ अइसन ही भइल ।अबकी बेर जब हम मामा घरे गइनी त कुछ नया कथा सुने के मिलल।भइल का कि हम गजराजगंज बाजार प उतर के अपना मामा घरे जाये खातिर पैदल चल देनी।जाड़ा के दिन रहे आ संझवत के बेर हो गइल रहे। डेढ़ कोस जमीन पैदल चलला के बाद गांव में हेलत हेलत अन्हार हो गइल।गांव के बहरी धूस प बुझाइल कि कुछ नवहा लइका हुड़गुड़ान कइले बाड़न स । नजदीक गइनी त देखनी कि सब आपने टोला के लइका रहन स आ दिसा-मैदान करे गांव के बहरी आइल रहन स।
“गोड़ लाग तानी दीपक भइया’’-ओह में से तीन गो चिन्ह के प्रणाम कइलन स ।
“खुश रह लोग”- इहे कह के हम ओहनी से गांव घर के नीक-जबुन पूछे लगनी। “जान तार कि ना भइया ?काल्ह मोहन बाबा त पिटा गइले ।पुलिस खूब मरले बिया।”-एगो लइका कहलस।
“काहे खातिर हो?”-हम आपन मफ़लर ठीक करके कहनी । एकरा बाद उ लइका सब कथा सुनावे लागल-
“आरे काहे खातिर ?काल्ह गइल रहन मैट्रिक के परीक्षा के सेंटर पर ।इनकर भतीजी नू परीक्षा दे तिया। चोरी करावे खातिर देवाल प चढ़ल रहन ।साथे त हरेन्दर भइया रहन, आ किसुना चाचा भी । जब पुलिस डंटा लेके खदेरलस त ऊ लोग त देवाल प से कूद के भाग गइल लोग, बाकिर इ पचास बरिस के आदमी ना भागे पइले आ धरा गइले ।पहिले त पुलिसवा पांच डंटा मरलस फ़ेर अपना एसपी भीरी ले गइल आ कहता- ‘सर, इ बुढ़वा चोरी करवा रहा था।’ ‘सरवा’………बुढ़ आदमी देवाल पर चढ़ गया था और इससे कूऽऽऽदे नहीं हुआ। हा हा हा………………
ओकरा बाद पुलिस मोहन बाबा के थाना में ले गइल रहे ।दू हजार रुपया लेलस तब छोड़्लस। पइसा त गांवे के रंगलाल साह से बीस रुपया सैकड़ा के भावे सूद प उठा के गइल हा।”

लइकन के मंडली में से एगो दोसर लइका, जवन अब तक चुप रहे ,कहे लागल --
“मोहन बाबा त कहत रहले हा कि जब थाना में गइले त थाना में के बड़का साहेब इनका के चिन्ह गइल आ ‘क्षमा महाराज’ कहके गोड़े पर लोटिया गइल। उ त उनकर जजमान नू रहे ।पहिले अपना सिपाही के चार झापड़ मरलस ।ओकरा बाद कहे लागल कि ‘महाराज जी गलती हो गइल।इ बुरबक सिपाही रउरा के ना चिन्हलस महाराज।’फ़ेर एगो सिपाही से कह के चाह-चुक्कड़ मंगवलस ।चाह –पानी पियला के बाद उ
मोहन बाबा के एक सै एकइस गो रुपया से गोड़पूजी कके अपना सिपाही संगे जीप से भेजे लागल त मोहन बाबा ओकरा के बरियारी एक हजार रुपया दे दीहले आ कहले –‘ जजमान ,तहार नोकरी के बात बा ।चोरी में धराइल बानी त फ़ाएन भरहीं के नू परी।एह से हइ रुपयइवा ले ल ।आ तब मोहन बाबा ओहीजा से अइले।”
“आ चुप ना रह ।इ बभना असहीं हांकेला।ओकरा खाये के बा अपना घरे ? मांग के त खाला। चलल बा पइसा देबे।पीठांस प लाठी बाजल बा पुलिस के, त लाजे का कही?लाज पचावता।” -एगो दोसर लइका कहलस । हम खाली चुप सब सुनत रहीं।
फ़ेर पहिलका लइका कहे लागल लागल-“आ जान तार कि ना ? सत्यम मिसिर के भी दू लाठी बाजल बा।”
सत्यम मिसिर हमार लइकाईं के संघतिया रहन । हमरा इ बात सुन के अचरज भइल।उनकर बाबूजी ओही शहर में मकान बनवले बाड़े जहां एह बेर मैट्रिक के परीक्षा के सेंटर रहे ।हम पूछ लेनी –“उ काहे पिटा गइले हो?”
उ लइका कहे लागल-“जब परीक्षा चलता, ओह बेरा प सेन्टर प घूमे जइब, त मार ना खइब ?उनका के दरोगा पकड़ लेलस आ कहता -‘ अरे लौंडा, तुम यहां चोरी करवाने आया है?’सत्यम भाइ त आपन फ़ैशन में हाफ़ पाएंट में घूमत रहन ,कह तारे-‘नहीं सर ,हम तो मौर्निंग वाक करने आये हैं’। दरोगवा खिसिया गइल आ कहता-‘बहिन…………,दिन में बारह बजे मौर्निंग वाक कर रहा है।’आ दू लाठी मरलस ।बेचारे सत्यम मिसिर आपन पिछ्वाड़ा सुहरावत ओहीजा से भाग चलले।”
“आ जान तार कि ना भ इया अब त तिरभुवन बाबा के बहार भइल बा। भर गांव में कहत चलत तारे कि ‘मोहना’ त चोरी करावत धराइल बा ,उ कुजात हो गइल ।‘बाभन धरम आ इहे करम।’ अब ओकरा से पूजा-पाट करावे के धरम नइखे ।एह से अब हम भर गांव में पूजा कराइब।”
दोसरका लइका के इ बात सुन के हम हंस पड़नीं । नजर उठा के देखनीं त घर भी आ गइल रहे आ नाना जी ललटेन जरा के दालानी में रामायण पढ़त रहन ।

-सुस्मित सौरभ
एयर फ़ोर्स स्टेशन,हिन्डन
गाजियाबाद,यू पी

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