गुरुवार, 22 जुलाई 2010

अकिला फुआ

अकिला फुआ
अकिला फुआ ‌‍जइसे कि नाम से जगजाहिर बा गाँव के उ औरत जेकरा अकिल से समूचा गांव चलेला . हर गांव में एकाध गो अकिला फुआ रहेला लोग .भोजपुर में कहाउत कहल जाला कि “बिना गांगो के झूमर ना होखे”ओसहीं बिना अकिला फुआ के कवनो जग परोजन ना पार लाग सके. केहू किहाँ लइका भइल होखे,केहू के बकरी भुलाइल होखे,कवनो बियाह शादी होखे चाहे केहू किहाँ चोरी भइल होखे सगरे अकिला फुआ के बोलावल जाला.
हमरो गाँव में एगो अकिला फुआ बाड़ी .उनकर असली नाम त कुछ और ह लेकिन उनका के अकिला फुआ के नाम से ही बोलावल जाला .
एक बेर के बात ह.सिकुमार पांडे के बेटी के बियाह रहे .बरियात के दिन रहे .लइकी के ससुरा से पेन्हावे खातिर लुगा-झूला आइल रहे.लइकी के ससुरा वाला तानी एडभांस रहन स.एह से कपड़ा लत्ता संगे एक जोड़ी सैंडिल भी भेजले रहन स.सब कपड़ा लत्ता पेन्हावला के बाद गाँव के औरतन के नजर सैंडिल पर पड़ल .अब ओहनी के बुझइबे न करे कि इ कवन गहना ह ?सब लोग बड़ा फेरा पर गइल कि अब का कइल जाव .अगर ना पेन्हावल जाइ त लइकी के ससुरावालन के सोझा बेइज्जत होखे के परी.कहिहन स कि एकदम गंवार बाड़न स.आ पेन्हावल जाव त कवना अंग में पेन्हावल जाव इ बुझात न रहे.सांप छुछुन्दर वाला हाल भइल रहे .ना सैंडिल पेन्हावही आवत रहे आ इज्जत जाए के डर से छोड़तो ना बनत रहे .अब का कइल जाव.अंत में सभके सलाह भइल कि अब अकिला फुआ ही कुछ कर सकेली आ उनके के बोलावल जाव .आदमी दउड़लन स अकिला फुआ के बोलावे खातिर .आधा घंटा के बाद गत्ते-गत्ते चलत अकिला फुआ अइली .आवते लइकी के माई अकिला फुआ के गोड़ प गिर गइली आ दूनो आँखिन में लोर भर के कहे लगली –“आह ए फुआ जी , अब हमनी के इज्जत रउरे हाथ में बा .कसहूँ हमनी के इज्जत राखीं .”
अकिला फुआ लइकी के माई के उठवली आ आँचर से उनकर लोर पोछ के कहली –“चुप रह बउरहीनिया.हम जिन्दा बानी नू .कवन अइसन काम बा जे अकिला फुआ ना जानस .देखाव ता कवन गहना आइल बा जवन तोहनी के पेन्हावे नइखे आवत .”
अकिला फुआ के सैंडिल देखावल गइल .एक बेर त उहो सोच में पर गइली.कुछ देर सैंडिल के उलट-पलट के देखली .फेर कुछ सोच के हँसे लगली.कहली –“आह ए हमार करम,अब हम का करीं?आरे,तहरा लोग के तबे से इहे ना बुझात रहल हा!”
सब लोग अकिला फुआ के घेर लेल . ‘का ह फुआ जी,का ह फुआ जी’ कहे लागल लोग.ओही में से केहू कहल –‘हम कहत रहीं नू कि अकिला फुआ सब जानेली .उ जरुर बता दिहें कि इ गहना कहाँ पेन्हल जाला?’
अब अकिला फुआ के पारी रहे . कहली –“आरे इ नएका जमाना के आयरन(इयररिंग)नू ह”.आ फेर लइकी के माई से कहली-“आरे रामझरिया के माई,ले जो आपना बेटी के कान में पहिरा दे”.
आँगन में के भीड़ अकिला फुआ के जय जयकार करे लागल .आ सैंडिल लइकी के दूनो कान में पहिरा देल गइल .
“ अथश्री अकिला फुआ आख्यान”

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