संतोष
इ मालूम त नइखे कि हमार सोचल कतना सही बा, लेकिन हमरा इहे बुझाला कि आदमी के जब घाव लागेला त ‘दरद के अहसास’,ओतना ना होखे जतना कि ओह घाव पर सनेह से मरहम लगावत समय होला ।एगो छोट लइका खेलत-खेलत भहरा के गिर परेला आ पहिले चारो ओर ताकेला,फ़ेर जइसे ही ओकर नजर घर के कवनो सनेहिल आदमी प परेला त उ जोर-जोर से रोवे लागेला।हमरो एह बात के पता अभी कुछ दिन पहिले ही चलल हा। बात इ भइल कि हम जवन विभाग में काम करीला ओहीजा बिन बियाहल लोगन के रहे आ खाये के वेवस्था(व्यवस्था) मेस में कइल जाला आ ओह लोगन में से एगो प्रतिनिधि होलन जे मेस के प्रबंधन के काम देखेलन।कुछ दिन खातिर इ भार हमरा के भी दिहल गइल।मेस में खाना टेबुल प पहुँचावे आ पलेट धोवे खातिर दू-तीन गो लइका रहेलन स ।ओहनिओ के देख रेख हमरे जिम्मे रहे।ओहनी से खाना लगवावे,घटल-बढ़ल देखे,पलेट साफ करवावे ,कुल मिला के सारा बेवस्था जवना से खाये वाला लोग के कवनो दिक्कत ना होखे, हमरे देखे के रहे।संजोग से तीनो लइकवा भोजपुरी बोले वाला रहन स एह से ओहनी से हमरा तनी बेसी लगाव हो गइल रहे।उमिर का होइ इहे पंद्रह से अठारह बरिस के होइहें स।एगो जवन Sसबसे बड़ रहे उ बलिया जिला के रहे आ दू गो छोटका बक्सर आ सासाराम के रहन स।तीनो के नाम एक लाइन से सुभाष,हरेन्दर आ जवाहर रहे।बड़ा इज्ज्त देत रहन स बेचारा ।भोजपुरी में ही ओहनी से बतियइतीं,हमार एके बोली प कवनो काम करे के तेयार रहतन स।मेस में खाये वाला भी ओहनी के काम से खुश रहे लोग।सब लोग से सर-सर कह के इज्जत से बतियइतन स,सब काम धाम करितन स ,मेस चम-चम करित ।केहु के हमरा प्रबंधन से कवनो सिकाइत ना रहे।भले लोग चुट्की लिहित “सौरभ जी,सब बिहारियों का संगठन बना लिये हैं।”
हम कुछ ना कहितीं खाली मुस्काके रह जइतीं।
जवाहर नाम के जवन लइका रहे उ हमरा से तनी ढेर घुलल मिलल रहे।एक दिन रात के खाना के बेरा प असहीं बतियावत रहीं त पूछनी –जवाहर,पढ़ाई लिखाई कुछ भइल बा कि ना?
हँ, सर मैट्रिक पास हईं।
त दोसर कवनो काम काहे ना कइला हा?
कहाँ काम मिलता सर?सगरे इहे हाल बा तीन हजार रुपेया में हाड़ तूर के काम करे के परेला ।एहीजा पइसा त तनी कम भेंटाला बाकिर खाये आ रहे खातिर कवनो खरच त ना लागे। अतनवे बहरी के पाँच हजार के बराबर बा।
मन लगेला?घरे से अतना दूर!
मन के का बा ए सर, खाये के मिली त कतहीं मन लागी।
कवनो तकलीफ़ नइखे नू ?कवनो गाढ़ सकेत होइ त कहिह ।
ना सर, सब राउर किरपा बा।
फ़ेर कुछ देर बाद उ कहलस-सर आज तरकारी नु खूबी बढ़िमा बनी है। आपकी खाना टेबुल में चहुँपा दूँ?
हमरा ओकर हिन्दी सुन के हँसी छुटल,कहनी- आरे अँग्रेज तू हमरा से भोजपुरी ना बोल सकेल?
ना सर उ हमहुँ हिन्दी बोले के सीख तानी नू।
nnnnnnठीके बा,सीख। हँ,आज खाना हमरा रूम में पहुँचा दीह। आज चाय जादे पी लेले बानी ,एह से भोजन तनी देर से करब ।
ठीक बा सर ,कहके आपन काम में लाग गइल।
रात के साढ़े नौ बजत होइ ।मुखर्जी जी शराब के नशा में धुत्त खाना खाये अइले। हम जवाहर से कहनी –“जवाहर तनी खाना लगा दे,हँ तनी धेयान से,बुझाता कि पियले बाड़े।”
कभी-कभी आदमी के कवनो बात के आभास समय से पहिलहीं हो जाला।हमरा जवन बात के डर रहे उहे भइल।जवाहर पहिले खाना दे देलस आ पानी देबे के
भुला गइल।तब तक मुखर्जी जी चिल्ला उठले-अरे जोवहोर,बहेन …,पानी कौन देगा रे,तेरा बाप?
जवाहर दौड़ के गइल पानी लेके।पानी देबे के चक्कर में तनी सा पानी मुखर्जी जी के गोड़ प गिर गइल ।फ़ेर का रहे माध……,बहिन……जइसन गारी के बरखा हो गइल जवाहर पर।बेचारा “गलती हो गया सर, गलती हो गया सर’’कहके माफ़ी माँगे लागल। बुझाइल कि मुखर्जी जी ओकरा के मार मत देस।हम जाके बीच-बचाव कइनी तब जाके ओकर जान छुटल। दस बजे मेस बंद हो गइल आ जवाहर हमार खाना लेके रूम में आइल ।देखनी कि ओकर मुँह उतरल रहे।
कहलस-सर खाना ले आइल बानी,खा लीहीं।
खा लेब,ध द ।तू खइल ?
ना सर।मन नइखे।
आरे बउराह,कवनो बात के हतना धर धइल जाला।जवन हो गइल तवन हो गइल। नोकरी करे नु आइल बाड़ ,इ सब होत रहेला।खाल ला एहिजे,हमरे में से दू गो रोटी ले ल।
हमार इ बात सुन के उ फ़फ़क उठल ।हमरा बुझाइल कि हम ओकर मन के घाव के गलती से छू देनी!कुछ देर रोवलस।हमहुँ ओकरा के रो लेबे देनी जेकरा से कि मन में दबल दरद निकल जाव ।फ़ेर कहे लागल –“सर देखनी हा नु कतना गारी देले हा।घरे हमरा के आज ले केहु डँटले ना रहे।”-उ तनी ढेर भावुक हो गइल रहे।
देख जवाहर,दारु-शराब पियला के बाद आदमी का कहेला ,इ ओकरा अपने ना याद ना रहे ।देख, दारु पिये वाला जब बोले त जनिह कि कवनो पागल कुकुर बर-बर कर ता। हमार इ कुकुर वाला बात सुन के ओकरा हँसी छूट गइल ।ओकरा के हँसत देख के मन के तनी सा राहत मिलल।इ बुझा गइल कि कवनो रोवत आदमी के हँसावे में कतना संतोष मिलेला। ओकरा के बरियारी दू गो रोटी खिया के भेजनी आ कहनी –“जा,जा के मन शांत कके सुत जा,ढ़ेर ना सोचे के।ओकरा गइला के बाद हमहुँ खाना खा के सुते के तेयारी करे लगनी।बाकी मन में एगो बड़ संतोष रहे।
-सुस्मित सौरभ
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