संस्मरण
मोटरसाइकिल से उड़ान
ठीक से ख्याल त नइखे परत कि इ कब के घटना ह बाकी अतना इयाद आवता कि हम इंटर पास कर गइल रहीं । ओह उमिर में देह में तनि ढेर जोस नु रहेला ।बात इ रहे कि हमरा मोटरसाइकिल चलावे के सवख(शौक) बड़ा जोर मरले रहे।उमिर का होइ ओह घरी ,इहे सतरह बरिस के होखब, कवनो ढेर ना रहे।सबसे बड़ बात त इ रहे कि हमरा छोटका भाई के मोटरसाइकिल चलावे आवत रहे ,आ हमरा उ चीज ना आवत रहे ,त तनि लाजो लागत रहे।मन ओह घरी बड़ा छोट हो जात रहे जब हम मोटरसाइकिल प अपना छोटका भाई के पीछे बइठ के कहीं आवत जात रहीं। उहो त पंदरहे बरिस के रहे ,एह से खुला छूट त ओकरो ना रहे बाकी इ रहे कि छोट-मोट काम मोटरसाइकिल से क लेआवत रहे । हं,त कहत रहनी हा कि मोटरसाइकिल चलावे त आवत ना रहे बाकिर पापा वाला इस्कूटर तनि-मनि चला लेत रहीं। छोटका भाई के ढेर साथी-संघाती रहन स एह से उ मोटरसाइकिलो प हाथ साफ क लेले रहे।
भगवान जी हमरो विनती सुनत रहन।उनको बुझाइल कि लइका साथे अनेयाय होता । आ हमरो मोटरसाइकिल चलावे के मौका मिलिए गइल।भइल का कि मामा के बियाह लागल ।लगन-पताइ के दिन रहे एह से गाड़ी-बस कि दिक्कत रहले रहे।काम –काज में कवनो आकाज चाहे कुबेरा मत होखे एह से हितइ से तीन गो मोटरसाइकिल मंगावल रही स । हमरा त भल के भलभलिये नु मिल गइल। छोटका भाई के मर-मनावन कइनी त उहो हमरा के मोटरसाइकिल सिखावे के तेयार हो गइल।बाकिर तय इ भइल कि मोटरसाइकिल के चाभी मांगे के काम हमार रही । चाभी मिले में भी कवनो ढेर परेसान ना होखे के परत रहे काहे कि बियाह-सादी के दिन में सभ केहु जुटल रहे,ओह मे केहु मामा रहे त केहु मौसा त केहु नाना।तनि-मनि ना-नुकुर कइला के बाद इ चेता के कि ‘गोड़-हाथ मत तुरिह लोग’ ,चाभी दे देत रहे लोग ।घर के आगे एगो छोट खरिहान रहे।ओकरे में तीन चार दिन में हम मोटरसाइकिल चलावे के सीख त लेनी बाकिर पक्का ड्राइबर ना भइल रहीं।
मामा के तिलक में एगो मोटरसाइकिल चढ़ल । हीरो-होन्डा के नया चमचमात मोटरसाइकिल । नया मोटरसाइकिल देख के हमरा छोटका भाई के मन में खुद्बुदी ले लेलस।एक दिन के बाद उ हमरा भिरी गते से आके कहता-
‘दीपक भैया रे,एगो बात कहीं?’
हम कहनी –‘कह ,का कह तारे?’
‘कह तानी नु कि नयेका हीरो-होन्डावा ना चलावे के?’
‘मन कइला से सब हो जाला?के दिही हमनी नियन नवसिखुआ के नया गाड़ी?’
‘मामा तोर बात के मानेलन ।तू मंगबे त दे दिहन।’
‘का उ इ ना जानस कि हमरा मोटरसाइकिल ना चलावे आवे।’
‘कह दिहे कि तु ना चलइबे हम चलाइब।’
‘ठीक बा देखब’-अतना कह के हम दोसर काम में लाग गइनी बाकिर अब इ बात हमरो दिमाग में घूमे लागल ।
बुध कि दिन रहे आ ओह दिन गजराजगंज में बाजार लागत रहे।सांझ के तरकारी ले आवे खातिर हमार खोजाहट होखे लागल काहे कि लइकन में बड़ हमहीं रहीं ।मौका त मिल गइल हमरा आ हमहूं ओकर फायदा उठाइये लेनी।मान मनौवल के बाद मोटरसाइकिल के चाभी हमरा हाथ में आइये गइल। ढेर बात कहल लोग ,चेतावल लोग, बाकिर कुछे सुनाइ देलस काहे कि नया गाड़ी चलावे के खुशी नु रहे। दुनो भाई पहिर-ओढ़ के चल देनी ज बाजार करे, नया मोटरसाइकिल प बइठ के, चलावत छोटके भाई रहे।बाजार में पहुंच के तरकारी खरिदाइल आ कुछ परचून के समान लेबे खातिर कवनो दोकान खोजाए लागल। अब हमार पारी रहे मोटरसाइकिल चलावे के ,एह से हम छोटका भाई से चाभी मंगनी।उ कहलस:-‘आरे ,आज बाजार ह आ भीड़ देखत नइख?एह से हमहीं मोटरसाइकिल चलाव तानी काहे कि तु अभी नया बाड़।भीड़ में कहीं धक्का मार देब।’
बाकिर हम ठान लेले रहीं कि आज हम मोटरसाइकिल चलइबे करब ।एह से बेचारा भाई के चाभी हमरा के देबहीं के परल । हम मोटरसाइकिल इस्टाट कइनी ,मन में खुशी त होते रहे ,बाकिर एगो डर नियन भी समाइल रहे ।जसहीं गेयर में डाल के गाड़ी आगे बढ़वनी ,गाड़ी बंद हो गइल । भाई फेर मना कइलस बाकिर घरी टेढ़ रहे आ हम ना मननी।दोबारा मोटरसाइकिल इस्टाट कके चल त देनी बाकिर जसहीं दस कदम गइल होखब तसहीं आगे से एगो ट्रक आ गइल ।पातर रोड रहे एह से मोटरसाइकिल धीम कर के ट्रक के निकले देनी आ जसहीं फ़ेर आगे बढ़े के कइनी पता ना चलल कि का भइल कवन गेयर लागल, कि कलच छुटल,गाड़ी हांय-हांय करके हवा में उड़ गइल। मोटरसाइकिल के अगिला चक्का उपर मुहें उठ गइल आ भाई जवन कि पिछिला सीट प बइठल रहे ,पीछे से घसक के नीचे गिर परल । गाड़ी के आवाज सुन के आ हालत देख के अगल-बगल के जतना आदमी रहन स, भाग चललन स। हमार त आंखेऽ मुदा गइल बाकिर गाड़ी अभी तक बंद ना भइल रहे। हमरा तनिको ना बुझाइल कि कब मोटरसाइकिल के अगिला चक्का जवन कि ऊपर उठल रहे,बगल के एगो दोकान के ओटा(छोट चबूतरा) पर जाके रुकल जवना के ऊंचाई लगभग चार फीट रहे । हमार आंख खुलल त देख तानी कि गाड़ी के अगिला चक्का ओटा पर टंगाइल बा आ पिछिला चक्का जमीन प बा आ साथे साथे हमहुं गाड़ी प लटकल बानी।एगो गोड़ कसहुं सहारा लेके गाड़ी के गिरे से बचा रहल बा। मोटरसाइकिल रह रह के हांय-हांय कर रहल बा आ एगो चक्का ओटा प बा एह से आगे नइखे बढ़ पावत ।तब जाके हम गाड़ी बंद कइनी।भर देह से हराहर पसेना छूटत रहे आ गोड़ थर-थर कांपत रहे।कसहुं मन के शांत कके दुनो भाई गाड़ी के अगिला चक्का के ओटा प से नीचे उतरनी जा । अगल-बगल ढेर लोग जमा हो गइल काहे कि ढेर दिन प लोगन के बिना पइसा के मन लाएक तमाशा देखे के मिलल रहे।ओह में से कुछ लोग कहत रहे कि जब ना चलावे आवे त काहे के चलावे ल लोग ।मन त लाजे काठ भइल जात रहे।इहे रहे कि मोटरसाइकिल में कुछ टूट-फूट भइल ना रहे खाली एक-आध गो खरोंच लागल रहे जवन कि बुझात ना रहे ।हमरा गोड़ में मोच आइल रहे बाकिर उ ओह समय दुखात ना रहे।
‘तोरा चोटो लागल बा ?’हम भाई से पूछ्नी।
‘ना। आ तोरा?’उ हमरा से पूछलस।
हमरो नइखे लागल।इहे कह के हम गाड़ी के मुआयना कइनी आ चाभी भाई के दे देनी। मोटरसाइकिल ओहिजे खड़ा करके परचून के समान किनाइल ।दस मिनट बाद घरे लवटे के बेरा इयाद परल कि मामा खातिर पान ले जाये के बा ।पान खरीदे खातिर बगल के पान के दोकान प गइनी जा त ओहिजा एगो हमरे उमिर के लइका बइठल रहे आ अपना आ अपना दादी से कहत रहे:-
‘दादी ए सड़कि प मत जइहे । आज शहर में से नया मोटरसाइकिल चलवनिहार आइल बाड़न स। आ जान तारे कि ना उ मोटरसाइकिल हाऽवाऽ में उड़ा दे तारन स । अबके नु घन्टा भ पहिले बाजार में भऽगद्दड़ मचल रहल हा।झलकिया के माई मुए से बाचल हिया।’
ओकर बात सुन के हमनी के दुनो भाई एक-दोसरा देने देख के धीरे से मुस्कुरा देनी जा।
सुस्मित सौरभ
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