अकिला फुआ
अकिला फुआ जइसे कि नाम से जगजाहिर बा गाँव के उ औरत जेकरा अकिल से समूचा गांव चलेला . हर गांव में एकाध गो अकिला फुआ रहेला लोग .भोजपुर में कहाउत कहल जाला कि “बिना गांगो के झूमर ना होखे”ओसहीं बिना अकिला फुआ के कवनो जग परोजन ना पार लाग सके. केहू किहाँ लइका भइल होखे,केहू के बकरी भुलाइल होखे,कवनो बियाह शादी होखे चाहे केहू किहाँ चोरी भइल होखे सगरे अकिला फुआ के बोलावल जाला.
हमरो गाँव में एगो अकिला फुआ बाड़ी .उनकर असली नाम त कुछ और ह लेकिन उनका के अकिला फुआ के नाम से ही बोलावल जाला .
एक बेर के बात ह.सिकुमार पांडे के बेटी के बियाह रहे .बरियात के दिन रहे .लइकी के ससुरा से पेन्हावे खातिर लुगा-झूला आइल रहे.लइकी के ससुरा वाला तानी एडभांस रहन स.एह से कपड़ा लत्ता संगे एक जोड़ी सैंडिल भी भेजले रहन स.सब कपड़ा लत्ता पेन्हावला के बाद गाँव के औरतन के नजर सैंडिल पर पड़ल .अब ओहनी के बुझइबे न करे कि इ कवन गहना ह ?सब लोग बड़ा फेरा पर गइल कि अब का कइल जाव .अगर ना पेन्हावल जाइ त लइकी के ससुरावालन के सोझा बेइज्जत होखे के परी.कहिहन स कि एकदम गंवार बाड़न स.आ पेन्हावल जाव त कवना अंग में पेन्हावल जाव इ बुझात न रहे.सांप छुछुन्दर वाला हाल भइल रहे .ना सैंडिल पेन्हावही आवत रहे आ इज्जत जाए के डर से छोड़तो ना बनत रहे .अब का कइल जाव.अंत में सभके सलाह भइल कि अब अकिला फुआ ही कुछ कर सकेली आ उनके के बोलावल जाव .आदमी दउड़लन स अकिला फुआ के बोलावे खातिर .आधा घंटा के बाद गत्ते-गत्ते चलत अकिला फुआ अइली .आवते लइकी के माई अकिला फुआ के गोड़ प गिर गइली आ दूनो आँखिन में लोर भर के कहे लगली –“आह ए फुआ जी , अब हमनी के इज्जत रउरे हाथ में बा .कसहूँ हमनी के इज्जत राखीं .”
अकिला फुआ लइकी के माई के उठवली आ आँचर से उनकर लोर पोछ के कहली –“चुप रह बउरहीनिया.हम जिन्दा बानी नू .कवन अइसन काम बा जे अकिला फुआ ना जानस .देखाव ता कवन गहना आइल बा जवन तोहनी के पेन्हावे नइखे आवत .”
अकिला फुआ के सैंडिल देखावल गइल .एक बेर त उहो सोच में पर गइली.कुछ देर सैंडिल के उलट-पलट के देखली .फेर कुछ सोच के हँसे लगली.कहली –“आह ए हमार करम,अब हम का करीं?आरे,तहरा लोग के तबे से इहे ना बुझात रहल हा!”
सब लोग अकिला फुआ के घेर लेल . ‘का ह फुआ जी,का ह फुआ जी’ कहे लागल लोग.ओही में से केहू कहल –‘हम कहत रहीं नू कि अकिला फुआ सब जानेली .उ जरुर बता दिहें कि इ गहना कहाँ पेन्हल जाला?’
अब अकिला फुआ के पारी रहे . कहली –“आरे इ नएका जमाना के आयरन(इयररिंग)नू ह”.आ फेर लइकी के माई से कहली-“आरे रामझरिया के माई,ले जो आपना बेटी के कान में पहिरा दे”.
आँगन में के भीड़ अकिला फुआ के जय जयकार करे लागल .आ सैंडिल लइकी के दूनो कान में पहिरा देल गइल .
“ अथश्री अकिला फुआ आख्यान”
गुरुवार, 22 जुलाई 2010
मोटरसाइकिल से उड़ान
संस्मरण
मोटरसाइकिल से उड़ान
ठीक से ख्याल त नइखे परत कि इ कब के घटना ह बाकी अतना इयाद आवता कि हम इंटर पास कर गइल रहीं । ओह उमिर में देह में तनि ढेर जोस नु रहेला ।बात इ रहे कि हमरा मोटरसाइकिल चलावे के सवख(शौक) बड़ा जोर मरले रहे।उमिर का होइ ओह घरी ,इहे सतरह बरिस के होखब, कवनो ढेर ना रहे।सबसे बड़ बात त इ रहे कि हमरा छोटका भाई के मोटरसाइकिल चलावे आवत रहे ,आ हमरा उ चीज ना आवत रहे ,त तनि लाजो लागत रहे।मन ओह घरी बड़ा छोट हो जात रहे जब हम मोटरसाइकिल प अपना छोटका भाई के पीछे बइठ के कहीं आवत जात रहीं। उहो त पंदरहे बरिस के रहे ,एह से खुला छूट त ओकरो ना रहे बाकी इ रहे कि छोट-मोट काम मोटरसाइकिल से क लेआवत रहे । हं,त कहत रहनी हा कि मोटरसाइकिल चलावे त आवत ना रहे बाकिर पापा वाला इस्कूटर तनि-मनि चला लेत रहीं। छोटका भाई के ढेर साथी-संघाती रहन स एह से उ मोटरसाइकिलो प हाथ साफ क लेले रहे।
भगवान जी हमरो विनती सुनत रहन।उनको बुझाइल कि लइका साथे अनेयाय होता । आ हमरो मोटरसाइकिल चलावे के मौका मिलिए गइल।भइल का कि मामा के बियाह लागल ।लगन-पताइ के दिन रहे एह से गाड़ी-बस कि दिक्कत रहले रहे।काम –काज में कवनो आकाज चाहे कुबेरा मत होखे एह से हितइ से तीन गो मोटरसाइकिल मंगावल रही स । हमरा त भल के भलभलिये नु मिल गइल। छोटका भाई के मर-मनावन कइनी त उहो हमरा के मोटरसाइकिल सिखावे के तेयार हो गइल।बाकिर तय इ भइल कि मोटरसाइकिल के चाभी मांगे के काम हमार रही । चाभी मिले में भी कवनो ढेर परेसान ना होखे के परत रहे काहे कि बियाह-सादी के दिन में सभ केहु जुटल रहे,ओह मे केहु मामा रहे त केहु मौसा त केहु नाना।तनि-मनि ना-नुकुर कइला के बाद इ चेता के कि ‘गोड़-हाथ मत तुरिह लोग’ ,चाभी दे देत रहे लोग ।घर के आगे एगो छोट खरिहान रहे।ओकरे में तीन चार दिन में हम मोटरसाइकिल चलावे के सीख त लेनी बाकिर पक्का ड्राइबर ना भइल रहीं।
मामा के तिलक में एगो मोटरसाइकिल चढ़ल । हीरो-होन्डा के नया चमचमात मोटरसाइकिल । नया मोटरसाइकिल देख के हमरा छोटका भाई के मन में खुद्बुदी ले लेलस।एक दिन के बाद उ हमरा भिरी गते से आके कहता-
‘दीपक भैया रे,एगो बात कहीं?’
हम कहनी –‘कह ,का कह तारे?’
‘कह तानी नु कि नयेका हीरो-होन्डावा ना चलावे के?’
‘मन कइला से सब हो जाला?के दिही हमनी नियन नवसिखुआ के नया गाड़ी?’
‘मामा तोर बात के मानेलन ।तू मंगबे त दे दिहन।’
‘का उ इ ना जानस कि हमरा मोटरसाइकिल ना चलावे आवे।’
‘कह दिहे कि तु ना चलइबे हम चलाइब।’
‘ठीक बा देखब’-अतना कह के हम दोसर काम में लाग गइनी बाकिर अब इ बात हमरो दिमाग में घूमे लागल ।
बुध कि दिन रहे आ ओह दिन गजराजगंज में बाजार लागत रहे।सांझ के तरकारी ले आवे खातिर हमार खोजाहट होखे लागल काहे कि लइकन में बड़ हमहीं रहीं ।मौका त मिल गइल हमरा आ हमहूं ओकर फायदा उठाइये लेनी।मान मनौवल के बाद मोटरसाइकिल के चाभी हमरा हाथ में आइये गइल। ढेर बात कहल लोग ,चेतावल लोग, बाकिर कुछे सुनाइ देलस काहे कि नया गाड़ी चलावे के खुशी नु रहे। दुनो भाई पहिर-ओढ़ के चल देनी ज बाजार करे, नया मोटरसाइकिल प बइठ के, चलावत छोटके भाई रहे।बाजार में पहुंच के तरकारी खरिदाइल आ कुछ परचून के समान लेबे खातिर कवनो दोकान खोजाए लागल। अब हमार पारी रहे मोटरसाइकिल चलावे के ,एह से हम छोटका भाई से चाभी मंगनी।उ कहलस:-‘आरे ,आज बाजार ह आ भीड़ देखत नइख?एह से हमहीं मोटरसाइकिल चलाव तानी काहे कि तु अभी नया बाड़।भीड़ में कहीं धक्का मार देब।’
बाकिर हम ठान लेले रहीं कि आज हम मोटरसाइकिल चलइबे करब ।एह से बेचारा भाई के चाभी हमरा के देबहीं के परल । हम मोटरसाइकिल इस्टाट कइनी ,मन में खुशी त होते रहे ,बाकिर एगो डर नियन भी समाइल रहे ।जसहीं गेयर में डाल के गाड़ी आगे बढ़वनी ,गाड़ी बंद हो गइल । भाई फेर मना कइलस बाकिर घरी टेढ़ रहे आ हम ना मननी।दोबारा मोटरसाइकिल इस्टाट कके चल त देनी बाकिर जसहीं दस कदम गइल होखब तसहीं आगे से एगो ट्रक आ गइल ।पातर रोड रहे एह से मोटरसाइकिल धीम कर के ट्रक के निकले देनी आ जसहीं फ़ेर आगे बढ़े के कइनी पता ना चलल कि का भइल कवन गेयर लागल, कि कलच छुटल,गाड़ी हांय-हांय करके हवा में उड़ गइल। मोटरसाइकिल के अगिला चक्का उपर मुहें उठ गइल आ भाई जवन कि पिछिला सीट प बइठल रहे ,पीछे से घसक के नीचे गिर परल । गाड़ी के आवाज सुन के आ हालत देख के अगल-बगल के जतना आदमी रहन स, भाग चललन स। हमार त आंखेऽ मुदा गइल बाकिर गाड़ी अभी तक बंद ना भइल रहे। हमरा तनिको ना बुझाइल कि कब मोटरसाइकिल के अगिला चक्का जवन कि ऊपर उठल रहे,बगल के एगो दोकान के ओटा(छोट चबूतरा) पर जाके रुकल जवना के ऊंचाई लगभग चार फीट रहे । हमार आंख खुलल त देख तानी कि गाड़ी के अगिला चक्का ओटा पर टंगाइल बा आ पिछिला चक्का जमीन प बा आ साथे साथे हमहुं गाड़ी प लटकल बानी।एगो गोड़ कसहुं सहारा लेके गाड़ी के गिरे से बचा रहल बा। मोटरसाइकिल रह रह के हांय-हांय कर रहल बा आ एगो चक्का ओटा प बा एह से आगे नइखे बढ़ पावत ।तब जाके हम गाड़ी बंद कइनी।भर देह से हराहर पसेना छूटत रहे आ गोड़ थर-थर कांपत रहे।कसहुं मन के शांत कके दुनो भाई गाड़ी के अगिला चक्का के ओटा प से नीचे उतरनी जा । अगल-बगल ढेर लोग जमा हो गइल काहे कि ढेर दिन प लोगन के बिना पइसा के मन लाएक तमाशा देखे के मिलल रहे।ओह में से कुछ लोग कहत रहे कि जब ना चलावे आवे त काहे के चलावे ल लोग ।मन त लाजे काठ भइल जात रहे।इहे रहे कि मोटरसाइकिल में कुछ टूट-फूट भइल ना रहे खाली एक-आध गो खरोंच लागल रहे जवन कि बुझात ना रहे ।हमरा गोड़ में मोच आइल रहे बाकिर उ ओह समय दुखात ना रहे।
‘तोरा चोटो लागल बा ?’हम भाई से पूछ्नी।
‘ना। आ तोरा?’उ हमरा से पूछलस।
हमरो नइखे लागल।इहे कह के हम गाड़ी के मुआयना कइनी आ चाभी भाई के दे देनी। मोटरसाइकिल ओहिजे खड़ा करके परचून के समान किनाइल ।दस मिनट बाद घरे लवटे के बेरा इयाद परल कि मामा खातिर पान ले जाये के बा ।पान खरीदे खातिर बगल के पान के दोकान प गइनी जा त ओहिजा एगो हमरे उमिर के लइका बइठल रहे आ अपना आ अपना दादी से कहत रहे:-
‘दादी ए सड़कि प मत जइहे । आज शहर में से नया मोटरसाइकिल चलवनिहार आइल बाड़न स। आ जान तारे कि ना उ मोटरसाइकिल हाऽवाऽ में उड़ा दे तारन स । अबके नु घन्टा भ पहिले बाजार में भऽगद्दड़ मचल रहल हा।झलकिया के माई मुए से बाचल हिया।’
ओकर बात सुन के हमनी के दुनो भाई एक-दोसरा देने देख के धीरे से मुस्कुरा देनी जा।
सुस्मित सौरभ
मोटरसाइकिल से उड़ान
ठीक से ख्याल त नइखे परत कि इ कब के घटना ह बाकी अतना इयाद आवता कि हम इंटर पास कर गइल रहीं । ओह उमिर में देह में तनि ढेर जोस नु रहेला ।बात इ रहे कि हमरा मोटरसाइकिल चलावे के सवख(शौक) बड़ा जोर मरले रहे।उमिर का होइ ओह घरी ,इहे सतरह बरिस के होखब, कवनो ढेर ना रहे।सबसे बड़ बात त इ रहे कि हमरा छोटका भाई के मोटरसाइकिल चलावे आवत रहे ,आ हमरा उ चीज ना आवत रहे ,त तनि लाजो लागत रहे।मन ओह घरी बड़ा छोट हो जात रहे जब हम मोटरसाइकिल प अपना छोटका भाई के पीछे बइठ के कहीं आवत जात रहीं। उहो त पंदरहे बरिस के रहे ,एह से खुला छूट त ओकरो ना रहे बाकी इ रहे कि छोट-मोट काम मोटरसाइकिल से क लेआवत रहे । हं,त कहत रहनी हा कि मोटरसाइकिल चलावे त आवत ना रहे बाकिर पापा वाला इस्कूटर तनि-मनि चला लेत रहीं। छोटका भाई के ढेर साथी-संघाती रहन स एह से उ मोटरसाइकिलो प हाथ साफ क लेले रहे।
भगवान जी हमरो विनती सुनत रहन।उनको बुझाइल कि लइका साथे अनेयाय होता । आ हमरो मोटरसाइकिल चलावे के मौका मिलिए गइल।भइल का कि मामा के बियाह लागल ।लगन-पताइ के दिन रहे एह से गाड़ी-बस कि दिक्कत रहले रहे।काम –काज में कवनो आकाज चाहे कुबेरा मत होखे एह से हितइ से तीन गो मोटरसाइकिल मंगावल रही स । हमरा त भल के भलभलिये नु मिल गइल। छोटका भाई के मर-मनावन कइनी त उहो हमरा के मोटरसाइकिल सिखावे के तेयार हो गइल।बाकिर तय इ भइल कि मोटरसाइकिल के चाभी मांगे के काम हमार रही । चाभी मिले में भी कवनो ढेर परेसान ना होखे के परत रहे काहे कि बियाह-सादी के दिन में सभ केहु जुटल रहे,ओह मे केहु मामा रहे त केहु मौसा त केहु नाना।तनि-मनि ना-नुकुर कइला के बाद इ चेता के कि ‘गोड़-हाथ मत तुरिह लोग’ ,चाभी दे देत रहे लोग ।घर के आगे एगो छोट खरिहान रहे।ओकरे में तीन चार दिन में हम मोटरसाइकिल चलावे के सीख त लेनी बाकिर पक्का ड्राइबर ना भइल रहीं।
मामा के तिलक में एगो मोटरसाइकिल चढ़ल । हीरो-होन्डा के नया चमचमात मोटरसाइकिल । नया मोटरसाइकिल देख के हमरा छोटका भाई के मन में खुद्बुदी ले लेलस।एक दिन के बाद उ हमरा भिरी गते से आके कहता-
‘दीपक भैया रे,एगो बात कहीं?’
हम कहनी –‘कह ,का कह तारे?’
‘कह तानी नु कि नयेका हीरो-होन्डावा ना चलावे के?’
‘मन कइला से सब हो जाला?के दिही हमनी नियन नवसिखुआ के नया गाड़ी?’
‘मामा तोर बात के मानेलन ।तू मंगबे त दे दिहन।’
‘का उ इ ना जानस कि हमरा मोटरसाइकिल ना चलावे आवे।’
‘कह दिहे कि तु ना चलइबे हम चलाइब।’
‘ठीक बा देखब’-अतना कह के हम दोसर काम में लाग गइनी बाकिर अब इ बात हमरो दिमाग में घूमे लागल ।
बुध कि दिन रहे आ ओह दिन गजराजगंज में बाजार लागत रहे।सांझ के तरकारी ले आवे खातिर हमार खोजाहट होखे लागल काहे कि लइकन में बड़ हमहीं रहीं ।मौका त मिल गइल हमरा आ हमहूं ओकर फायदा उठाइये लेनी।मान मनौवल के बाद मोटरसाइकिल के चाभी हमरा हाथ में आइये गइल। ढेर बात कहल लोग ,चेतावल लोग, बाकिर कुछे सुनाइ देलस काहे कि नया गाड़ी चलावे के खुशी नु रहे। दुनो भाई पहिर-ओढ़ के चल देनी ज बाजार करे, नया मोटरसाइकिल प बइठ के, चलावत छोटके भाई रहे।बाजार में पहुंच के तरकारी खरिदाइल आ कुछ परचून के समान लेबे खातिर कवनो दोकान खोजाए लागल। अब हमार पारी रहे मोटरसाइकिल चलावे के ,एह से हम छोटका भाई से चाभी मंगनी।उ कहलस:-‘आरे ,आज बाजार ह आ भीड़ देखत नइख?एह से हमहीं मोटरसाइकिल चलाव तानी काहे कि तु अभी नया बाड़।भीड़ में कहीं धक्का मार देब।’
बाकिर हम ठान लेले रहीं कि आज हम मोटरसाइकिल चलइबे करब ।एह से बेचारा भाई के चाभी हमरा के देबहीं के परल । हम मोटरसाइकिल इस्टाट कइनी ,मन में खुशी त होते रहे ,बाकिर एगो डर नियन भी समाइल रहे ।जसहीं गेयर में डाल के गाड़ी आगे बढ़वनी ,गाड़ी बंद हो गइल । भाई फेर मना कइलस बाकिर घरी टेढ़ रहे आ हम ना मननी।दोबारा मोटरसाइकिल इस्टाट कके चल त देनी बाकिर जसहीं दस कदम गइल होखब तसहीं आगे से एगो ट्रक आ गइल ।पातर रोड रहे एह से मोटरसाइकिल धीम कर के ट्रक के निकले देनी आ जसहीं फ़ेर आगे बढ़े के कइनी पता ना चलल कि का भइल कवन गेयर लागल, कि कलच छुटल,गाड़ी हांय-हांय करके हवा में उड़ गइल। मोटरसाइकिल के अगिला चक्का उपर मुहें उठ गइल आ भाई जवन कि पिछिला सीट प बइठल रहे ,पीछे से घसक के नीचे गिर परल । गाड़ी के आवाज सुन के आ हालत देख के अगल-बगल के जतना आदमी रहन स, भाग चललन स। हमार त आंखेऽ मुदा गइल बाकिर गाड़ी अभी तक बंद ना भइल रहे। हमरा तनिको ना बुझाइल कि कब मोटरसाइकिल के अगिला चक्का जवन कि ऊपर उठल रहे,बगल के एगो दोकान के ओटा(छोट चबूतरा) पर जाके रुकल जवना के ऊंचाई लगभग चार फीट रहे । हमार आंख खुलल त देख तानी कि गाड़ी के अगिला चक्का ओटा पर टंगाइल बा आ पिछिला चक्का जमीन प बा आ साथे साथे हमहुं गाड़ी प लटकल बानी।एगो गोड़ कसहुं सहारा लेके गाड़ी के गिरे से बचा रहल बा। मोटरसाइकिल रह रह के हांय-हांय कर रहल बा आ एगो चक्का ओटा प बा एह से आगे नइखे बढ़ पावत ।तब जाके हम गाड़ी बंद कइनी।भर देह से हराहर पसेना छूटत रहे आ गोड़ थर-थर कांपत रहे।कसहुं मन के शांत कके दुनो भाई गाड़ी के अगिला चक्का के ओटा प से नीचे उतरनी जा । अगल-बगल ढेर लोग जमा हो गइल काहे कि ढेर दिन प लोगन के बिना पइसा के मन लाएक तमाशा देखे के मिलल रहे।ओह में से कुछ लोग कहत रहे कि जब ना चलावे आवे त काहे के चलावे ल लोग ।मन त लाजे काठ भइल जात रहे।इहे रहे कि मोटरसाइकिल में कुछ टूट-फूट भइल ना रहे खाली एक-आध गो खरोंच लागल रहे जवन कि बुझात ना रहे ।हमरा गोड़ में मोच आइल रहे बाकिर उ ओह समय दुखात ना रहे।
‘तोरा चोटो लागल बा ?’हम भाई से पूछ्नी।
‘ना। आ तोरा?’उ हमरा से पूछलस।
हमरो नइखे लागल।इहे कह के हम गाड़ी के मुआयना कइनी आ चाभी भाई के दे देनी। मोटरसाइकिल ओहिजे खड़ा करके परचून के समान किनाइल ।दस मिनट बाद घरे लवटे के बेरा इयाद परल कि मामा खातिर पान ले जाये के बा ।पान खरीदे खातिर बगल के पान के दोकान प गइनी जा त ओहिजा एगो हमरे उमिर के लइका बइठल रहे आ अपना आ अपना दादी से कहत रहे:-
‘दादी ए सड़कि प मत जइहे । आज शहर में से नया मोटरसाइकिल चलवनिहार आइल बाड़न स। आ जान तारे कि ना उ मोटरसाइकिल हाऽवाऽ में उड़ा दे तारन स । अबके नु घन्टा भ पहिले बाजार में भऽगद्दड़ मचल रहल हा।झलकिया के माई मुए से बाचल हिया।’
ओकर बात सुन के हमनी के दुनो भाई एक-दोसरा देने देख के धीरे से मुस्कुरा देनी जा।
सुस्मित सौरभ
शुक्रवार, 9 जुलाई 2010
मैट्रिक के परीक्षा
कहानी
मैट्रिक के परीक्षा
जब मैट्रिक के परीक्षा नजदीक आवेला त कवनो ना कवनो कथनी के जनम होइये जाला। एह बेर के परीक्षा में भी कुछ अइसन ही भइल ।अबकी बेर जब हम मामा घरे गइनी त कुछ नया कथा सुने के मिलल।भइल का कि हम गजराजगंज बाजार प उतर के अपना मामा घरे जाये खातिर पैदल चल देनी।जाड़ा के दिन रहे आ संझवत के बेर हो गइल रहे। डेढ़ कोस जमीन पैदल चलला के बाद गांव में हेलत हेलत अन्हार हो गइल।गांव के बहरी धूस प बुझाइल कि कुछ नवहा लइका हुड़गुड़ान कइले बाड़न स । नजदीक गइनी त देखनी कि सब आपने टोला के लइका रहन स आ दिसा-मैदान करे गांव के बहरी आइल रहन स।
“गोड़ लाग तानी दीपक भइया’’-ओह में से तीन गो चिन्ह के प्रणाम कइलन स ।
“खुश रह लोग”- इहे कह के हम ओहनी से गांव घर के नीक-जबुन पूछे लगनी। “जान तार कि ना भइया ?काल्ह मोहन बाबा त पिटा गइले ।पुलिस खूब मरले बिया।”-एगो लइका कहलस।
“काहे खातिर हो?”-हम आपन मफ़लर ठीक करके कहनी । एकरा बाद उ लइका सब कथा सुनावे लागल-
“आरे काहे खातिर ?काल्ह गइल रहन मैट्रिक के परीक्षा के सेंटर पर ।इनकर भतीजी नू परीक्षा दे तिया। चोरी करावे खातिर देवाल प चढ़ल रहन ।साथे त हरेन्दर भइया रहन, आ किसुना चाचा भी । जब पुलिस डंटा लेके खदेरलस त ऊ लोग त देवाल प से कूद के भाग गइल लोग, बाकिर इ पचास बरिस के आदमी ना भागे पइले आ धरा गइले ।पहिले त पुलिसवा पांच डंटा मरलस फ़ेर अपना एसपी भीरी ले गइल आ कहता- ‘सर, इ बुढ़वा चोरी करवा रहा था।’ ‘सरवा’………बुढ़ आदमी देवाल पर चढ़ गया था और इससे कूऽऽऽदे नहीं हुआ। हा हा हा………………
ओकरा बाद पुलिस मोहन बाबा के थाना में ले गइल रहे ।दू हजार रुपया लेलस तब छोड़्लस। पइसा त गांवे के रंगलाल साह से बीस रुपया सैकड़ा के भावे सूद प उठा के गइल हा।”
लइकन के मंडली में से एगो दोसर लइका, जवन अब तक चुप रहे ,कहे लागल --
“मोहन बाबा त कहत रहले हा कि जब थाना में गइले त थाना में के बड़का साहेब इनका के चिन्ह गइल आ ‘क्षमा महाराज’ कहके गोड़े पर लोटिया गइल। उ त उनकर जजमान नू रहे ।पहिले अपना सिपाही के चार झापड़ मरलस ।ओकरा बाद कहे लागल कि ‘महाराज जी गलती हो गइल।इ बुरबक सिपाही रउरा के ना चिन्हलस महाराज।’फ़ेर एगो सिपाही से कह के चाह-चुक्कड़ मंगवलस ।चाह –पानी पियला के बाद उ
मोहन बाबा के एक सै एकइस गो रुपया से गोड़पूजी कके अपना सिपाही संगे जीप से भेजे लागल त मोहन बाबा ओकरा के बरियारी एक हजार रुपया दे दीहले आ कहले –‘ जजमान ,तहार नोकरी के बात बा ।चोरी में धराइल बानी त फ़ाएन भरहीं के नू परी।एह से हइ रुपयइवा ले ल ।आ तब मोहन बाबा ओहीजा से अइले।”
“आ चुप ना रह ।इ बभना असहीं हांकेला।ओकरा खाये के बा अपना घरे ? मांग के त खाला। चलल बा पइसा देबे।पीठांस प लाठी बाजल बा पुलिस के, त लाजे का कही?लाज पचावता।” -एगो दोसर लइका कहलस । हम खाली चुप सब सुनत रहीं।
फ़ेर पहिलका लइका कहे लागल लागल-“आ जान तार कि ना ? सत्यम मिसिर के भी दू लाठी बाजल बा।”
सत्यम मिसिर हमार लइकाईं के संघतिया रहन । हमरा इ बात सुन के अचरज भइल।उनकर बाबूजी ओही शहर में मकान बनवले बाड़े जहां एह बेर मैट्रिक के परीक्षा के सेंटर रहे ।हम पूछ लेनी –“उ काहे पिटा गइले हो?”
उ लइका कहे लागल-“जब परीक्षा चलता, ओह बेरा प सेन्टर प घूमे जइब, त मार ना खइब ?उनका के दरोगा पकड़ लेलस आ कहता -‘ अरे लौंडा, तुम यहां चोरी करवाने आया है?’सत्यम भाइ त आपन फ़ैशन में हाफ़ पाएंट में घूमत रहन ,कह तारे-‘नहीं सर ,हम तो मौर्निंग वाक करने आये हैं’। दरोगवा खिसिया गइल आ कहता-‘बहिन…………,दिन में बारह बजे मौर्निंग वाक कर रहा है।’आ दू लाठी मरलस ।बेचारे सत्यम मिसिर आपन पिछ्वाड़ा सुहरावत ओहीजा से भाग चलले।”
“आ जान तार कि ना भ इया अब त तिरभुवन बाबा के बहार भइल बा। भर गांव में कहत चलत तारे कि ‘मोहना’ त चोरी करावत धराइल बा ,उ कुजात हो गइल ।‘बाभन धरम आ इहे करम।’ अब ओकरा से पूजा-पाट करावे के धरम नइखे ।एह से अब हम भर गांव में पूजा कराइब।”
दोसरका लइका के इ बात सुन के हम हंस पड़नीं । नजर उठा के देखनीं त घर भी आ गइल रहे आ नाना जी ललटेन जरा के दालानी में रामायण पढ़त रहन ।
-सुस्मित सौरभ
एयर फ़ोर्स स्टेशन,हिन्डन
गाजियाबाद,यू पी
मैट्रिक के परीक्षा
जब मैट्रिक के परीक्षा नजदीक आवेला त कवनो ना कवनो कथनी के जनम होइये जाला। एह बेर के परीक्षा में भी कुछ अइसन ही भइल ।अबकी बेर जब हम मामा घरे गइनी त कुछ नया कथा सुने के मिलल।भइल का कि हम गजराजगंज बाजार प उतर के अपना मामा घरे जाये खातिर पैदल चल देनी।जाड़ा के दिन रहे आ संझवत के बेर हो गइल रहे। डेढ़ कोस जमीन पैदल चलला के बाद गांव में हेलत हेलत अन्हार हो गइल।गांव के बहरी धूस प बुझाइल कि कुछ नवहा लइका हुड़गुड़ान कइले बाड़न स । नजदीक गइनी त देखनी कि सब आपने टोला के लइका रहन स आ दिसा-मैदान करे गांव के बहरी आइल रहन स।
“गोड़ लाग तानी दीपक भइया’’-ओह में से तीन गो चिन्ह के प्रणाम कइलन स ।
“खुश रह लोग”- इहे कह के हम ओहनी से गांव घर के नीक-जबुन पूछे लगनी। “जान तार कि ना भइया ?काल्ह मोहन बाबा त पिटा गइले ।पुलिस खूब मरले बिया।”-एगो लइका कहलस।
“काहे खातिर हो?”-हम आपन मफ़लर ठीक करके कहनी । एकरा बाद उ लइका सब कथा सुनावे लागल-
“आरे काहे खातिर ?काल्ह गइल रहन मैट्रिक के परीक्षा के सेंटर पर ।इनकर भतीजी नू परीक्षा दे तिया। चोरी करावे खातिर देवाल प चढ़ल रहन ।साथे त हरेन्दर भइया रहन, आ किसुना चाचा भी । जब पुलिस डंटा लेके खदेरलस त ऊ लोग त देवाल प से कूद के भाग गइल लोग, बाकिर इ पचास बरिस के आदमी ना भागे पइले आ धरा गइले ।पहिले त पुलिसवा पांच डंटा मरलस फ़ेर अपना एसपी भीरी ले गइल आ कहता- ‘सर, इ बुढ़वा चोरी करवा रहा था।’ ‘सरवा’………बुढ़ आदमी देवाल पर चढ़ गया था और इससे कूऽऽऽदे नहीं हुआ। हा हा हा………………
ओकरा बाद पुलिस मोहन बाबा के थाना में ले गइल रहे ।दू हजार रुपया लेलस तब छोड़्लस। पइसा त गांवे के रंगलाल साह से बीस रुपया सैकड़ा के भावे सूद प उठा के गइल हा।”
लइकन के मंडली में से एगो दोसर लइका, जवन अब तक चुप रहे ,कहे लागल --
“मोहन बाबा त कहत रहले हा कि जब थाना में गइले त थाना में के बड़का साहेब इनका के चिन्ह गइल आ ‘क्षमा महाराज’ कहके गोड़े पर लोटिया गइल। उ त उनकर जजमान नू रहे ।पहिले अपना सिपाही के चार झापड़ मरलस ।ओकरा बाद कहे लागल कि ‘महाराज जी गलती हो गइल।इ बुरबक सिपाही रउरा के ना चिन्हलस महाराज।’फ़ेर एगो सिपाही से कह के चाह-चुक्कड़ मंगवलस ।चाह –पानी पियला के बाद उ
मोहन बाबा के एक सै एकइस गो रुपया से गोड़पूजी कके अपना सिपाही संगे जीप से भेजे लागल त मोहन बाबा ओकरा के बरियारी एक हजार रुपया दे दीहले आ कहले –‘ जजमान ,तहार नोकरी के बात बा ।चोरी में धराइल बानी त फ़ाएन भरहीं के नू परी।एह से हइ रुपयइवा ले ल ।आ तब मोहन बाबा ओहीजा से अइले।”
“आ चुप ना रह ।इ बभना असहीं हांकेला।ओकरा खाये के बा अपना घरे ? मांग के त खाला। चलल बा पइसा देबे।पीठांस प लाठी बाजल बा पुलिस के, त लाजे का कही?लाज पचावता।” -एगो दोसर लइका कहलस । हम खाली चुप सब सुनत रहीं।
फ़ेर पहिलका लइका कहे लागल लागल-“आ जान तार कि ना ? सत्यम मिसिर के भी दू लाठी बाजल बा।”
सत्यम मिसिर हमार लइकाईं के संघतिया रहन । हमरा इ बात सुन के अचरज भइल।उनकर बाबूजी ओही शहर में मकान बनवले बाड़े जहां एह बेर मैट्रिक के परीक्षा के सेंटर रहे ।हम पूछ लेनी –“उ काहे पिटा गइले हो?”
उ लइका कहे लागल-“जब परीक्षा चलता, ओह बेरा प सेन्टर प घूमे जइब, त मार ना खइब ?उनका के दरोगा पकड़ लेलस आ कहता -‘ अरे लौंडा, तुम यहां चोरी करवाने आया है?’सत्यम भाइ त आपन फ़ैशन में हाफ़ पाएंट में घूमत रहन ,कह तारे-‘नहीं सर ,हम तो मौर्निंग वाक करने आये हैं’। दरोगवा खिसिया गइल आ कहता-‘बहिन…………,दिन में बारह बजे मौर्निंग वाक कर रहा है।’आ दू लाठी मरलस ।बेचारे सत्यम मिसिर आपन पिछ्वाड़ा सुहरावत ओहीजा से भाग चलले।”
“आ जान तार कि ना भ इया अब त तिरभुवन बाबा के बहार भइल बा। भर गांव में कहत चलत तारे कि ‘मोहना’ त चोरी करावत धराइल बा ,उ कुजात हो गइल ।‘बाभन धरम आ इहे करम।’ अब ओकरा से पूजा-पाट करावे के धरम नइखे ।एह से अब हम भर गांव में पूजा कराइब।”
दोसरका लइका के इ बात सुन के हम हंस पड़नीं । नजर उठा के देखनीं त घर भी आ गइल रहे आ नाना जी ललटेन जरा के दालानी में रामायण पढ़त रहन ।
-सुस्मित सौरभ
एयर फ़ोर्स स्टेशन,हिन्डन
गाजियाबाद,यू पी
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