गुरुवार, 31 मार्च 2011

माई

कहानी
माई
ट्रींग-ट्रींग …………पापा के मोबाइल के घंटी बाजल।
पापा कवनो काम करत रहन एह से हमहीं फ़ोन उठवनी।
हैलो,के बोलता?पुष्पक! का हाल बा हो,ठीक बाड़ नु?
के, दीपक भइया?गोड़ लागतानी।हम ठीक बानी।तु कहिया अइल हा दिल्ली से?
खुश रह।काल्हे अइनी हा हो। आ तु कहिया आव तार?दसहरा में अब तीने दिन बाकी दिन बा।
काल्ह सांझ के गाड़ी धरब आ परसों भोरे उतर जाइब ।कलकत्ता से आरा आवे में कतना देर लागेला?माई बिया?तनी माई के मोबाइल दिह त।
हँ ,एहिजे बिया ,दे तानी ।
इहे कह के मोबाइल माई के धरा दिहनी।
माई का-का बतियवलस इ त हमरा ना बुझाइल बाकी आहे प बुझे के कोसिस करे लगनी।पहिले त उ पुष्पक के आसीरबाद(आशिर्वाद) दिहलस ।फ़ेर नीक-जबुन पूछे लागल।बुझाइल कि पुष्पक कुछ किने(खरीदे) खातिर माई के कहलस, काहे कि माई एने से मना कके कहे लागल- ‘हमरा खातिर कुछ मत किनिह’। आ मोबाइल हमरा के दे देलस।पुष्पक अभी लाइन पर ही रहे।कहे लागल-
‘देख तार नु दीपक भइया,हमार नया नोकरी लागल बा आ पहिले-पहिल पइसा मिलल बा।माई से कहनी हा कि तोरा खातिर एगो साड़ी किन के ले आव तानी त मना कर तिया।साथे के सब लइका अपना घरे के लोग खातिर कुछ ना कुछ किन के ले जा तारन स।’
‘आरे जानत नइख।माई नु हिय ।हमनी पर लाखों रुपया खरच करे के होइ त कर दिही बाकिर अपना खातिर कुछ खरच ना कइल चाहे।तहरा जवन निमन लागी तु लेले अइह।’ हम इहे कह के फ़ोन काट देनी।
हमनी के दू गो भाई बानी जा। पुष्पक हमरा से cछोट ह। हम दिल्ली में एगो सरकारी नोकरी करी ला। पुष्पक एगो मल्टीनेसनल कँपनी में सौफ़्ट्वेयर इंजिनियर बा। अभी दु महीना पहिले कलकत्ता में ज्वाइन कइलस हा।पापा सरकारी हाई स्कूल में मास्टर बाड़न ।माई घरे के काम काज देखे ले।हम दसहरा के छुट्टी में घरे आइल बानी।
दोसरा दिने भोरे-भोरे पुष्पक भी घरे आ गइल । हाल समाचार भइल ।सब केहु खातिर कुछ ना कुछ ले आइल रहे।पापा खातिर एगो बढ़िया सूट के कपड़ा आ हमरा खातिर एगो जींस टी-सर्ट ले आईल रहे।सबसे अंत में निकललस एगो साड़ी जवन कि उ माई खातिर ले आईल रहे।खूब निमन सिलिक(सिल्क) के साड़ी रहे बंगाली प्रिंट के।बड़ा निमन लागित माई पहिरित त।देखले से महंगा बुझात रहे। पापा व्यंग कइले-‘बुझात त बा कि सबसे महंगा समान तहरा माई के ही आईल बा का हो ,दीपक?’
पुष्पक हँसे लागल।कहलस-‘ना पापा,अइसन बात नइखे ।तहरो कपड़ा कवनो सस्ता ना ह।बाकिर माई के साड़ी तहरा कपड़ा से एक हजार रुपया महंगा ह । सूट त 5000 रुपया के ह आ साड़ी 6000 के।माई सब सुनत रहे,पुष्पक से कहे लागल-‘तु बउराह हव। अतना महंगा साड़ी किनला के कवन जरुरत रहल हा?’पइसा धरित अपना लगे ,बाहर-भीतर रह तार। कवनो कामे आइत।
माई के बात सुन के पुष्पक डबडबा गइल आ कहलस-माई तोरा के हम लाखों रुपया के साड़ी ले आइब तबो उ हमरा खातिर कम होई।ओह गरीबी में हमनी खातिर तु जवन कइले बाड़े ओकर मोल हमनी से ना दिआई। माहौल तनी गंभीर हो गइल।
पुष्पक फ़ेर कहे लागल-दीपक भइया,तहरा त इयाद बा नु कि हमनी के कवन हाल रहे जब पापा के स्कूल के सब मास्टर लोग के वेतन एके हाली बंद हो गइल रहे आ पापा केआमदनी के जरिया खेती छोड़ के और कुछ ना रह गइल रहे।तबो पापा हमनी के आरा के सबसे बढ़िया स्कूल में पढ़ावत रहन आ हमनी के कवनो कमी ना होखे दिहले। पापा आ माई, हमनी के मन इ बात कबो ना आवे देल लोग कि वेतन ना मिलला से उनका लोग के हमनी के पढ़ावे में कवनो दिक्कत होता।
हँ हो ,इ त तू ठीके कह तार।जतना तेयाग(त्याग) इ लोग हमनी खातिर कइले बा लोग ओकर मोल हमनी से कबो दिहल जाई?कबो ना दिहल जा सके।–हम कहनी।
पुष्पक के आँखिन के कोर से लोर बाहर निकल के गाल प आ गइल रहे।बुझाइल कि पुरान घाव फ़ेर से हरियर हो गइल बा।उ आपन लइकाईं के बात सोच के ढ़ेर भावुक हो गइल रहे।पापा आ माई अकचका के खाली ओकर मुँह ताकत रहे लोग ।उ आगे कहे लागल-
बड़ स्कूलन में गरीब के लइकन के कबो ना पढ़े के चाहीं।काहे कि ओहिजा पढ़ाई से जादे चमक-दमक प ध्यान देल जाला। तहरा इआद पड़ता नू उ दिन जहिया हमनी के स्कूल में पैरेंट्स डे मनावल जात रहे।एगो त जबरजस्ती हमनी दूनो भाई के ओह में गुजराती नाच में हिस्सा लेबे खातिर मजबूर कइल गइल आ ओह में पेन्हे खातिर कुरता-पैजामा और चुंदरी प्रिन्ट के ओढ़नी आ आठ गो रुमाल के वेवस्था करे के कहल गइल । हमनी के आके इ बात माई से कहनी जा।माई कुरता-पैजामा के वेवस्था त अगल-बगल से माँग के क देलस बाकी ओढ़नी आ रुमाल ना मिल पाइल ।खरिदे खातिर हिसाब जोड़ाइल त लगभग डेढ़ सौ रुपया होत रहे जवन कि हमनी के परिवार ढ़ेर महँगा रहे ।
पुष्पक के बात सुन के हमरो आँख के सामने उ दिन सिनेमा के पर्दा के चित्र नियन साफ़-साफ़ लउकत रहे आ हमरो मन भीतर से भरल आवत रहे।बाकी मन के कठोर कइले रहीं।देखनीं कि पापा आ माई एक दोसरा देने चोर के नजर देखत रहे लोग । पुष्पक कहले जात रहे-
तब बड़ा सोच में पड़ गइल आदमी कि का कइल जाव?एक दिन के नाच-गान खातिर अतना पइसा खरच करे में हमनी के सोचे के पड़त रहे काहे कि घरे के आर्थिक स्थिति भी ठीक ना रहे।अंत में माई आपन एक-दू बेर के पेन्हल चुन्दरी प्रिन्ट के नया साड़ी ले आइल आ ओकरा के कइंची से काट के हमनी खातिर ओढ़नी आ रुमाल बना के दिहलस ।तब हमनी के गइनी जा स्कूल में सब कपड़ा लेके आ हमनी के नाच-गाना भइल।
–इहे कह के पुष्पक आपन बात खतम क इलस।अब ओकरा मुँह पर एगो शांति के भाव रहे आ लोर सुखा गइल रहे दुनो गाल पर।
माई के देखनी ,ओकरा मुँह प एगो मुस्कान रहे।बुझात रहे कि हमनी से कहत रहे कि तू लोग ब उराह हव लोग ।पापा भी भाव-विह्वल हो ग इल रहले।कुछ देर ले सब लोग शांत रहल ।फ़ेर बात उघरल पुष्पक देने से ही।उ माई देने देख के कहलस-
आ ओह दिन हम इ सोच लेले रहीं माई कि जहिया हम नोकरी करब त पहिले तोरा खातिर एगो खूब निमन साड़ी खरीदब ।
हमनी के बेटा अब बड़ हो गइलन स,ना हो ।-पापा माई देने देख के कहले।
आरे,बउराह हवन स इ।माई-बाप के कामे ह अतना करे के।अब उठ लोग,खाना नइखे खाये के?-इहे कह के माई रसोईयाघर देने चल देलस ।

-सुस्मित सौरभ

संतोष

संतोष

इ मालूम त नइखे कि हमार सोचल कतना सही बा, लेकिन हमरा इहे बुझाला कि आदमी के जब घाव लागेला त ‘दरद के अहसास’,ओतना ना होखे जतना कि ओह घाव पर सनेह से मरहम लगावत समय होला ।एगो छोट लइका खेलत-खेलत भहरा के गिर परेला आ पहिले चारो ओर ताकेला,फ़ेर जइसे ही ओकर नजर घर के कवनो सनेहिल आदमी प परेला त उ जोर-जोर से रोवे लागेला।हमरो एह बात के पता अभी कुछ दिन पहिले ही चलल हा। बात इ भइल कि हम जवन विभाग में काम करीला ओहीजा बिन बियाहल लोगन के रहे आ खाये के वेवस्था(व्यवस्था) मेस में कइल जाला आ ओह लोगन में से एगो प्रतिनिधि होलन जे मेस के प्रबंधन के काम देखेलन।कुछ दिन खातिर इ भार हमरा के भी दिहल गइल।मेस में खाना टेबुल प पहुँचावे आ पलेट धोवे खातिर दू-तीन गो लइका रहेलन स ।ओहनिओ के देख रेख हमरे जिम्मे रहे।ओहनी से खाना लगवावे,घटल-बढ़ल देखे,पलेट साफ करवावे ,कुल मिला के सारा बेवस्था जवना से खाये वाला लोग के कवनो दिक्कत ना होखे, हमरे देखे के रहे।संजोग से तीनो लइकवा भोजपुरी बोले वाला रहन स एह से ओहनी से हमरा तनी बेसी लगाव हो गइल रहे।उमिर का होइ इहे पंद्रह से अठारह बरिस के होइहें स।एगो जवन Sसबसे बड़ रहे उ बलिया जिला के रहे आ दू गो छोटका बक्सर आ सासाराम के रहन स।तीनो के नाम एक लाइन से सुभाष,हरेन्दर आ जवाहर रहे।बड़ा इज्ज्त देत रहन स बेचारा ।भोजपुरी में ही ओहनी से बतियइतीं,हमार एके बोली प कवनो काम करे के तेयार रहतन स।मेस में खाये वाला भी ओहनी के काम से खुश रहे लोग।सब लोग से सर-सर कह के इज्जत से बतियइतन स,सब काम धाम करितन स ,मेस चम-चम करित ।केहु के हमरा प्रबंधन से कवनो सिकाइत ना रहे।भले लोग चुट्की लिहित “सौरभ जी,सब बिहारियों का संगठन बना लिये हैं।”
हम कुछ ना कहितीं खाली मुस्काके रह जइतीं।
जवाहर नाम के जवन लइका रहे उ हमरा से तनी ढेर घुलल मिलल रहे।एक दिन रात के खाना के बेरा प असहीं बतियावत रहीं त पूछनी –जवाहर,पढ़ाई लिखाई कुछ भइल बा कि ना?
हँ, सर मैट्रिक पास हईं।
त दोसर कवनो काम काहे ना कइला हा?
कहाँ काम मिलता सर?सगरे इहे हाल बा तीन हजार रुपेया में हाड़ तूर के काम करे के परेला ।एहीजा पइसा त तनी कम भेंटाला बाकिर खाये आ रहे खातिर कवनो खरच त ना लागे। अतनवे बहरी के पाँच हजार के बराबर बा।
मन लगेला?घरे से अतना दूर!
मन के का बा ए सर, खाये के मिली त कतहीं मन लागी।
कवनो तकलीफ़ नइखे नू ?कवनो गाढ़ सकेत होइ त कहिह ।
ना सर, सब राउर किरपा बा।
फ़ेर कुछ देर बाद उ कहलस-सर आज तरकारी नु खूबी बढ़िमा बनी है। आपकी खाना टेबुल में चहुँपा दूँ?
हमरा ओकर हिन्दी सुन के हँसी छुटल,कहनी- आरे अँग्रेज तू हमरा से भोजपुरी ना बोल सकेल?
ना सर उ हमहुँ हिन्दी बोले के सीख तानी नू।
nnnnnnठीके बा,सीख। हँ,आज खाना हमरा रूम में पहुँचा दीह। आज चाय जादे पी लेले बानी ,एह से भोजन तनी देर से करब ।
ठीक बा सर ,कहके आपन काम में लाग गइल।
रात के साढ़े नौ बजत होइ ।मुखर्जी जी शराब के नशा में धुत्त खाना खाये अइले। हम जवाहर से कहनी –“जवाहर तनी खाना लगा दे,हँ तनी धेयान से,बुझाता कि पियले बाड़े।”
कभी-कभी आदमी के कवनो बात के आभास समय से पहिलहीं हो जाला।हमरा जवन बात के डर रहे उहे भइल।जवाहर पहिले खाना दे देलस आ पानी देबे के
भुला गइल।तब तक मुखर्जी जी चिल्ला उठले-अरे जोवहोर,बहेन …,पानी कौन देगा रे,तेरा बाप?
जवाहर दौड़ के गइल पानी लेके।पानी देबे के चक्कर में तनी सा पानी मुखर्जी जी के गोड़ प गिर गइल ।फ़ेर का रहे माध……,बहिन……जइसन गारी के बरखा हो गइल जवाहर पर।बेचारा “गलती हो गया सर, गलती हो गया सर’’कहके माफ़ी माँगे लागल। बुझाइल कि मुखर्जी जी ओकरा के मार मत देस।हम जाके बीच-बचाव कइनी तब जाके ओकर जान छुटल। दस बजे मेस बंद हो गइल आ जवाहर हमार खाना लेके रूम में आइल ।देखनी कि ओकर मुँह उतरल रहे।
कहलस-सर खाना ले आइल बानी,खा लीहीं।
खा लेब,ध द ।तू खइल ?
ना सर।मन नइखे।
आरे बउराह,कवनो बात के हतना धर धइल जाला।जवन हो गइल तवन हो गइल। नोकरी करे नु आइल बाड़ ,इ सब होत रहेला।खाल ला एहिजे,हमरे में से दू गो रोटी ले ल।
हमार इ बात सुन के उ फ़फ़क उठल ।हमरा बुझाइल कि हम ओकर मन के घाव के गलती से छू देनी!कुछ देर रोवलस।हमहुँ ओकरा के रो लेबे देनी जेकरा से कि मन में दबल दरद निकल जाव ।फ़ेर कहे लागल –“सर देखनी हा नु कतना गारी देले हा।घरे हमरा के आज ले केहु डँटले ना रहे।”-उ तनी ढेर भावुक हो गइल रहे।
देख जवाहर,दारु-शराब पियला के बाद आदमी का कहेला ,इ ओकरा अपने ना याद ना रहे ।देख, दारु पिये वाला जब बोले त जनिह कि कवनो पागल कुकुर बर-बर कर ता। हमार इ कुकुर वाला बात सुन के ओकरा हँसी छूट गइल ।ओकरा के हँसत देख के मन के तनी सा राहत मिलल।इ बुझा गइल कि कवनो रोवत आदमी के हँसावे में कतना संतोष मिलेला। ओकरा के बरियारी दू गो रोटी खिया के भेजनी आ कहनी –“जा,जा के मन शांत कके सुत जा,ढ़ेर ना सोचे के।ओकरा गइला के बाद हमहुँ खाना खा के सुते के तेयारी करे लगनी।बाकी मन में एगो बड़ संतोष रहे।


-सुस्मित सौरभ